कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १०० कहैं 'मैं विभीषनकी कछु न सबील की' । लाज बाँह बोलेकी, नेवाजेकी सँभार-सार, साहेबु न रामु से बलाइ लेउँ सीलकी ॥५२॥ बड़े-बड़े वीर अभिमानी मेघनादसे ललकारकर भिड़ गये और उन्होंने अपने-अपने पुरुषार्थमें कमी नहीं की । लक्ष्मणजीको घायल देखकर श्रीरामचन्द्रजी बिलखने लगे और जगत्के निवासस्थान ( भगवान् ) के दिलकी आशाएँ शिथिल हो गयीं । तुलसीदासके स्वामीको न तो भाईका मोह है और न जानकीजीकी ममता है, वे यही कह रहे हैं कि मैंने विभीषणके लिये कुछ भी प्रबन्ध नहीं किया । उन्हें तो अपनी शरणमें लियेकी लाज है और अपने अनुगृहीत दासकी सार-सँभालका ख्याल है । श्रीरामचन्द्रजीके समान कोई स्वामी नहीं है, मैं उनके शीलकी बलिहारी जाता हूँ । कानन बासु, दसाननु सो रिपु, आननश्री ससि जीति लियो है । बालि महा बलसालि दल्यो, कपि पालि बिभीषनु भूपु कियो है ॥ तीय हरी, रन बंधु पर्यो, पै भरयो सरनागत-सोच हियो है । बाँह-पगार उदार कृपाल कहाँ रघुबीरू सो बीरु बियो है ॥५३॥ वनमें निवास है और दसमुख रावणके समान प्रबल शत्रु है, तो भी प्रभुके मुखकी शोभाने चन्द्रमाकी शोभाको जीत लिया