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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

कवितावली १०० कहैं 'मैं विभीषनकी कछु न सबील की' । लाज बाँह बोलेकी, नेवाजेकी सँभार-सार, साहेबु न रामु से बलाइ लेउँ सीलकी ॥५२॥ बड़े-बड़े वीर अभिमानी मेघनादसे ललकारकर भिड़ गये और उन्होंने अपने-अपने पुरुषार्थमें कमी नहीं की । लक्ष्मणजीको घायल देखकर श्रीरामचन्द्रजी बिलखने लगे और जगत्‌के निवासस्थान ( भगवान् ) के दिलकी आशाएँ शिथिल हो गयीं । तुलसीदासके स्वामीको न तो भाईका मोह है और न जानकीजीकी ममता है, वे यही कह रहे हैं कि मैंने विभीषणके लिये कुछ भी प्रबन्ध नहीं किया । उन्हें तो अपनी शरणमें लियेकी लाज है और अपने अनुगृहीत दासकी सार-सँभालका ख्याल है । श्रीरामचन्द्रजीके समान कोई स्वामी नहीं है, मैं उनके शीलकी बलिहारी जाता हूँ । कानन बासु, दसाननु सो रिपु, आननश्री ससि जीति लियो है । बालि महा बलसालि दल्यो, कपि पालि बिभीषनु भूपु कियो है ॥ तीय हरी, रन बंधु पर्यो, पै भरयो सरनागत-सोच हियो है । बाँह-पगार उदार कृपाल कहाँ रघुबीरू सो बीरु बियो है ॥५३॥ वनमें निवास है और दसमुख रावणके समान प्रबल शत्रु है, तो भी प्रभुके मुखकी शोभाने चन्द्रमाकी शोभाको जीत लिया

१०१ लंकाकाण्ड है । महाबलशाली बालिको मारकर सुग्रीवकी रक्षा की और विभीषणको राजा बनाया । इधर स्त्री हरी गयी और भाई भी समरमें गिर गये; तो भी हृदयमें शरणागतकी ही चिन्ता है । भला, श्रीराम- चन्द्रजीके समान अपनी भुजाका आश्रय देनेवाला उदार और दयालु वीर दूसरा कहाँ मिलेगा ? लीन्हो उखारि पहारु बिसाल, चल्यो तेहि काल, बिलंबु न लायो । मारुतनंदन मारुतको, मनको, खगराजको वेगु लजायो ॥ तीखी तुरा 'तुलसी' कहतो, पै हिएँ उपमाको समाउ न आयो । मानो प्रतच्छ परब्बतकी नभ लीक लसी, कपि यों धुकि धायो ॥५४॥ [ लक्ष्मणजीकी मूर्च्छानिवृत्तिके लिये जब सुषेणने सञ्जीवनी बूटी निश्चित की तो उसे लानेके लिये श्रीहनुमान् जी द्रोणाचल पर्वतपर गये । तब उसे पहचान न सकनेके कारण ] उन्होंने उस विशाल पर्वतको उखाड़ लिया और तनिक भी विलम्ब न कर तत्काल चल दिये । उस समय मारुतनन्दन ( हनुमान्जी ) ने वायु, गरुड़ और मनकी गतिको भी लज्जित कर दिया । गोसाईंजी कहते हैं कि मैं उनके प्रचण्ड वेगका वर्णन करता; परन्तु हृदयमें उसकी उपमाकी सामग्री कहीं नहीं मिली । हनुमान्जी झपटकर ऐसे दौड़े कि आकाशमें पर्वतकी प्रत्यक्ष लकीर-सी शोभित होने लगी । [ तात्पर्य यह कि ऐसी शीघ्रतासे हनुमान्जी पर्वत लेकर चले कि चलने और

कवितावली १०२ पहुँचनेके स्थानतक एक ही पर्वत मालूम होता था । ] चल्यो हनुमानु, सुनि जातुधानु कालनेमि पठयो, सो मुनि भयो, पायो फलु छलि कै । सहसा उखारो है पहारु बहु जोजनको, रखवारे मारे भारे भूरि भट दलि कै ॥ बेगु, बलु, साहसु, सराहत कृपाल रामु, भरतकी कुसल, अचलू ल्यायो चलि कै । हाथ हरिनाथके बिकाने रघुनाथु जनु, सीलसिंधु तुलसीस भलो मान्यो भलि कै ॥५५॥ हनुमान्‌जीका जाना सुन रावणने राक्षस कालनेमिको भेजा । उसने मुनिका वेष बनाया और इस प्रकार छल करनेका फल पाया, अर्थात्‌ मारा गया । हनुमान्‌जीने अनेकों योजनके पर्वतको सहसा उखाड़ लिया और रक्षकोंको मारकर बड़े-बड़े अनेक वीरोंका नाश कर दिया । 'देखो, हनुमान्‌जी चलकर पर्वत और भरतजीका कुशल-समाचार लाये हैं'—ऐसा कहकर कृपालु रघुनाथजी उनके बल, साहस और वेगकी सराहना करने लगे । मानो श्रीरामचन्द्रजी कपिनाथ (हनुमान्‌जी) के हाथ बिक गये । तुलसीदासके स्वामी शीलसिन्धु श्रीरामचन्द्रने सम्यक् प्रकारसे उनका उपकार माना । युद्धका अन्त बाप दियो काननु भो आननु सुभाननु सो, बैरी भो दसाननु सो, तीयको हरनु भो । बालि बलसालि दलि, पालि कपिराजको,

६. लंकाकाण्ड (रावण युद्ध व विजय)

१०३ लंकाकाण्ड विभीषनु नेवाजि, सेत सागर-तरनु भो ॥ घोर रारि हेरि त्रिपुरारि-बिधि हारे हिएँ, घायल लखन बीर बानर बरनु भो । ऐसे सोकमें तिलोकु कै बिसोक पलही में, सबही को तुलसीको साहेबु सरनु भो ॥५६॥ पिताने वनवास दिया, रावण-जैसा वीर शत्रु हो गया, जिसके द्वारा सीताजी हरी गयीं, तो भी जिनका मुख बड़ा प्रसन्न रहा- मलिन नहीं हुआ। बलशाली बालिको मारकर सुग्रीवकी रक्षा की, विभीषणपर कृपा की और पुल बाँधकर समुद्रको लाँघा; फिर जिनके घोर युद्धको देखकर शिव और ब्रह्मा भी हृदयमें हार गये और वीर लक्ष्मणजी घायल होकर (खून और मिट्टीसे ऐसे लथपथ हो गये कि) उनका रंग वानरोंका-सा (भूरा) हो गया। ऐसे शोकमें भी जिन्होंने तीनों लोकोंको पलमात्रमें विशोक कर दिया अर्थात् लक्ष्मणजीको सचेत और रावणको मारकर सबकी रक्षा की, वे तुलसीदासके प्रभु सभीको शरण देनेवाले हुए । कुंभकरन्नु हन्यो रन राम, दल्यो दसकंधरु, कंधर तोरे । पूषनबंसविभूषन-पूषन-तेज-प्रताप गरे अरि-ओरे ॥ देव निसान बजावत, गावत, सावँतु गो, मनभावत भो रे । नाचत बानर-भालु सबै 'तुलसी' कहि 'हा रे! हहा भै अहो रे!'।५७। भगवान् रामने युद्धमें कुम्भकर्णको मारा और रावणकी गर्दनें तोड़कर उसका भी वध किया। इस प्रकार सूर्यवंशविभूषण श्रीराम- रूप सूर्यके प्रतापरूप तेजसे शत्रुरूपी ओले गल गये । देवतालोग नगाड़े बजाकर गाते हैं, क्योंकि उनका सामन्तपना

कवितावली १०४ (अधीनता) चला गया और उनकी मनभायी बात हुई है। तथा वानर-भालु भी सब-के-सब 'ओहो रे ! खूब हुई, ओहो रे ! खूब हुई' ऐसा कहकर नाचते हैं। मारे रन रातिचर रावनु सकुल दलि, अनुकूल देव-मुनि फूल बरषतु हैं। नाग, नर, किंनर, बिरंचि, हरि, हरु हेरि पुलक सरीर, हिएँ हेतु हरषतु हैं॥ बाम ओर जानकी कृपानिधानके बिराजैं, देखत बिषादु मिटै, मोदु करषतु हैं। आयसु भो, लोकनि सिधारे लोकपाल सबै, 'तुलसी' निहाल कै कै दिये सरखतु हैं॥५८॥ श्रीरामचन्द्रजीने रावणका उसके कुलसहित दलन कर युद्धमें राक्षसोंका संहार किया। इससे देवता और मुनिगण प्रसन्न होकर फूलोंकी वर्षा करने लगे। यह देखकर नाग, नर, किन्नर तथा ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीके शरीर पुलकित हो जाते हैं और हृदयमें प्रेम और आनन्द भर जाता है। कृपानिधान (श्रीरामचन्द्रजी) की बायीं ओर जानकीजी विराजमान हैं, जिनके दर्शनसे विषाद मिट जाता है और आनन्द वृद्धिको प्राप्त होता है। लोकपाल सब आज्ञा पाकर अपने-अपने लोकोंको चले गये। गोसाईंजी कहते हैं कि भगवान्‌ने सबको निहाल कर-करके मानो परवाना दे दिया (कि अब तुमलोग निर्भय रहो)। इति लंकाकाण्ड

उत्तरकाण्ड रामकी कृपालुता बालि-सो बीरु बिदारि सुकंठु थप्यो, हरषे सुर, बाजने बाजे । पलमें दल्यो दासरथीं दसकंधरु, लंक विभीषनु राज बिराजे ॥ राम-सुभाउ सुनैं 'तुलसी' हुलसै अलसी हम-से गलगाजे । कायर क्रूर कपूतनकी हद, तेउ गरीबनेवाज नेवाजे ॥१॥ बालि-से वीरको मारकर ( श्रीरामचन्द्रजीने ) सुग्रीवको राज्य दिया । इससे देवता लोग हर्षित होकर बाजे बजाने लगे । दशरथनन्दन ( श्रीरामचन्द्र ) ने पलभरमें रावणको मार डाला और लंकामें विभीषण राज्यपर सुशोभित हुए । तुलसीदासजी कहते हैं—श्रीरामचन्द्रजीका खभाव सुनकर मेरे-जैसे और आलसी भी आनन्दित होकर गाल बजाते हैं । जो लोग कायर, क्रूर और कपूतोंकी हद थे, उनपर भी गरीबनिवाज भगवान् रामने कृपा की । बेद पढ़ैं विधि, संभु सभीत पुजावन रावनसों नितु आवैं । दानव-देव दयावने दीन दुखी दिन दूरिहि तें सिरु नावैं ॥ ऐसेउ भाग भगे दसभाल तें, जो प्रभुता कबि-कोबिद गावैं । रामसे बाम भएॅं तेहि बामहि बाम सबै सुख-संपति लावैं ॥२॥

कवितावली १०६ रावणके यहाँ ब्रह्माजी ( स्वयं ) वेदपाठ करते थे और शिवजी भयवश नित्यपूजन करानेके लिये आते थे तथा दैत्य और देवगण दुखी, दीन एवं दयापात्र होकर उसे प्रतिदिन दूरहीसे सिर नवाते थे । ऐसा भाग्य भी, जिसकी प्रभुता कवि-कोविद गाते हैं, उस रावणको छोड़कर भाग गया । श्रीरामचन्द्रसे विमुख होनेपर सारी सुख-सम्पदाएँ उस वामसे विमुख हो जाती हैं । बेदबिरुद्ध मही, मुनि, साधु ससोक किए, सुरलोकु उजारो । और कहा कहाँ, तीय हरी, तबहूँ करुनाकर कोपु न धारो ॥ सेवक-छोह तें छाड़ी छमा, तुलसीं लख्यो राम ! सुभाउ तिहारो। तौलौं न दापु दल्यो दसकंधर, जौलौं बिभीषन लातु न मारो ॥३॥ वेदविरुद्ध आचरण करनेवाले रावणने पृथ्वी, मुनिगण और साधुओंको शोकयुक्त कर दिया तथा देवलोकको उजाड़ डाला और कहाँतक कहें, उसने ( उनकी ) स्त्रीतकको चुरा लिया, तब भी करुणाकर ( प्रभु ) ने उसपर क्रोध नहीं किया । गोसाईंजी कहते हैं कि हे श्रीरामचन्द्रजी ! मैंने आपका स्वभाव जान लिया; आपने सेवक ( विभीषण ) के स्नेहवश ही ( अपनी स्वाभाविक ) क्षमाको छोड़ा; क्योंकि जबतक रावणने विभीषणको लात नहीं मारी तबतक आपने उसके दर्पको चूर्ण नहीं किया । सोकसमुद्र निमज्जत काढ़ि कपीसु कियो, जगु जानत जैसो । नीच निसाचर बैरिको बंधु बिभीषनु कीन्ह पुरंदर-कैसो ॥ नाम लिएँ अपनाइ लियो तुलसी-सो, कहौ, जग कौन अनैसो । आरत-आरति-भंजन रामु, गरीबनेवाज न दूसरो ऐसो ॥४॥

१०७ उत्तरकाण्ड आपने शोकरूपी समुद्रमें डूबते हुए सुग्रीवको निकालकर जिस प्रकार वानरोंका राजा बनाया, जो सारा संसार जानता है। नीच निशाचर और अपने शत्रुके भाई विभीषणको इन्द्रके समान (ऐश्वर्यशाली) बना दिया। केवल नाम लेनेसे ही तुलसी-जैसेको भी अपना लिया, जिसके समान बुरा संसारमें, कहो, दूसरा कौन है ? भगवान् राम ही दुखियोंके दुःखको दूर करनेवाले हैं; उनके-जैसा कोई दूसरा गरीबनिवाज नहीं है। मीत पुनीत कियो कपि-भालुको, पाल्यो ज्यों काहुँ न बाल तनूजौ। सज्जन-सींव बिभीषनु भो, अजहूँ बिलसै बर बंधुबधू जो॥ कोसलपाल बिना 'तुलसी' सरनागतपाल कृपाल न दूजो। क्रूर, कुजाति, कपूत, अघी, सबकी सुधरै, जो करै नरु पूजो ॥५॥ (उन्होंने) वानर और भालुओंतकको अपना पवित्र मित्र बनाया और उनकी ऐसी रक्षा की जैसी कोई अपने बालक पुत्र- की भी नहीं करेगा। और वे विभीषण, जो (चिरंजीवी होनेके कारण) आजतक अपने बड़े भाईकी स्त्री (मन्दोदरी) का उपभोग करते हैं, साधुताकी सीमा बन गये। गोसाईं जी कहते हैं कि कोसलेश्वर श्रीरामचन्द्रजीके अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा कृपालु और शरणागतोंकी रक्षा करनेवाला नहीं है। जो मनुष्य उनकी पूजा करते हैं उन सभीकी बन जाती है, चाहे वे क्रूर, कुजाति, कपूत और पापी ही क्यों न हों। तीय सिरोमनि सीय तजी, जेँहि पावककी कलुषाई दही है। धर्मधुरंधर बंधु तज्यो, पुरलोगनि की बिधि बोलि कही है॥

कवितावली १०८ कीस-निसाचरकी करनी न सुनी, न बिलोकी, न चित्त रही है। राम सदा सरनागतकी अनखौंही, अनैसी सुभायँ सही है ॥६॥ जिन्होंने अग्निकी अपवित्रता (दाहकता) को भी जला डाला (अर्थात् जिनका पवित्र स्पर्श पाकर अग्नि भी पवित्र और शीतल हो गयी) ऐसी नारीशिरोमणि जानकीजीको भी उन्होंने (लोकापवाद सुनकर) त्याग दिया; यही नहीं अपने धर्म-धुरन्धर बन्धु (लक्ष्मणजी) को (भी प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये) त्याग दिया और पुरजनोंको बुलाकर कर्तव्यका उपदेश दिया, किन्तु बंदर (सुग्रीवादि) और राक्षसों (विभीषणादि) की करनी (भ्रातृवधूसे भोग) को न तो सुना, न देखा और न चित्तमें ही रक्खा । इस प्रकार श्रीरामचन्द्रने अपने शरणागतोंकी क्रोध उत्पन्न करनेवाली बात और अनुचित बर्तावको भी सदा स्वभावसे ही सहा है । अपराध अगाध भएँ जनतें, अपनें उर आनत नाहिन जू । गनिका, गज, गीध, अजामिलके गनि पातकपुंज सिराहिं न जू ॥ लिएँ बारक नामु सुधाम् दियो, जेहिं धाम महामुनि जाहिं न जू । तुलसी ! भजु दीनदयालहि रे ! रघुनाथु अनाथहिदाहिन जू ।७। सेवकोंसे भारी-भारी अपराध हो जानेपर भी आप उन्हें अपने मनमें नहीं लाते (उनपर ध्यान नहीं देते) । गणिका, गज, गीध और अजामिलके पातकपुंज गिननेपर समाप्त होनेवाले नहीं थे; किन्तु उन्हें एक बार नाम लेनेसे भी वह परमधाम दिया, जिसमें महामुनि भी नहीं जा सकते । गोसाईंजी अपनेसे ही कहते हैं कि अरे तुलसीदास ! दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजीको भज; वे अनाथोंके अनुकूल (सहायक) हैं ।

१०९ उत्तरकाण्ड प्रभु सत्य करी प्रहलादगिरा, प्रगटे नरकेहरि खंभ महाँ । झषराज ग्रस्यो गजराज, कृपा ततकाल, बिलंबु कियो न तहाँ ॥ सुर साखि दै राखी है पांडुवधू पट लूटत, कोटिक भूप जहाँ । तुलसी ! भजु सोच विमोचनको, जनको पनु राम न राख्यो कहाँ ८ भगवान्‌ने प्रह्लादके वचनको सत्य किया और महान् खंभके बीचमेंसे नरसिंहरूपमें प्रकट हुए । जब ग्राहने गजको पकड़ा तो तत्काल ही कृपा की, ( जरा-सा भी ) विलम्ब नहीं किया । करोड़ों राजाओंके सामने जिसका वस्त्र लूटा जा रहा था, उस द्रौपदीकी देवताओंको साक्षी बनाकर रक्षा की । गोसाईंजी अपनेसे ही कहते हैं कि अरे तुलसीदास ! शोकसे छुड़ानेवाले श्रीरामचन्द्रको भज, उन्होंने सेवकके प्रणको कहाँ नहीं निबाहा ? नरनारि उघारि सभा महुँ होत दियो पटु, सोचु हर्यो मनको। प्रहलाद-बिषाद-निवारन, बारन-तारन, मीत अकारनको ॥ जो कहावत दीनदयाल सही, जेहि भारु सदा अपने पनको । 'तुलसी' तजि आन भरोस भजें, भगवानु भलो करिहैं जनको ९ नरावतार ( अर्जुन ) की स्त्री ( द्रौपदी ) सभामें नंगी की जा रही थी, उसे वस्त्र देकर उसके मनका सोच दूर किया। जो प्रह्लादके दुःखको दूर करनेवाले, गजको बचानेवाले, बिना कारणके मित्र और सच्चे दीनदयालु कहलाते हैं, जिनको अपने प्रणका सदैव भार ( ध्यान ) रहता है, गोसाईंजी कहते हैं कि औरोंका भरोसा त्याग कर उन भगवान्‌का भजन करनेसे वे अपने दासका भला करेंगेही । रिषिनारि उधारि, कियो सठ केवटु मीतु पुनीत, सुकीर्ति लही । निज लोकु दियो सबरी-खगको, कपि थाप्यो, सो मालुम है सबही॥

कवितावली ११० दससीस-बिरोध सभीत विभीषनु भूपु कियो, जग लीक रही । करुनानिधिको भजु, रे तुलसी ! रघुनाथु अनाथके नाथु सही १० (भगवान् रामने) ऋषि (गौतम) की पत्नी (अहल्या) का उद्धार किया और दुष्ट केवटको मित्र बनाकर पवित्र कर दिया, और इस प्रकार सुकीर्ति प्राप्त की; शबरी और गीधको अपना लोक दिया और सुग्रीवको राज्यपर स्थापित किया, सो सबको मालूम ही है; रावणके विरोधसे डरे हुए विभीषणको राजा बनाया जिससे उनकी कीर्ति संसारभरमें छा गयी । गोसाईंजी कहते हैं 'अरे तुलसीदास ! करुणानिधि (श्रीरामचन्द्र) को भज, वे अनाथोंके सच्चे स्वामी हैं।' कौसिक, विप्रबधू, मिथिलाधिपके सब सोच दले पल माहैं । वालि-दसानन-बंधु-कथा-सुनि, सत्रु सुसाहेव-सीलु सराहैं ॥ ऐसी अनूप कहैं तुलसी रघुनायककी अगनी गुनगाहैं । आरत, दीन, अनाथनको रघुनाथु करैं निज हाथकी छाँहैं ॥११॥ (श्रीरघुनाथजीने) विश्वामित्र, ऋषिपत्नी (अहल्या) और मिथिलापति (महाराज जनक) की सभी चिन्ताओंको पलभरमें हर लिया । बालि और रावणके भाई (सुग्रीव और विभीषण) की कथा सुनकर शत्रु भी हमारे श्रेष्ठ स्वामी (श्रीरामचन्द्रजी) के शीलकी सराहना करते हैं । गोसाईंजी श्रीरघुनाथजीकी ऐसी अगणित अनुपम गुणगाथाएँ कहते हैं । आर्त्त, दीन और अनाथोंको रघुनाथजी अपने हाथकी छाया-तले कर लेते हैं । तेरे बेसाहें बेसाहत औरनि, और बेसाहि कै बेचनहारे । ब्योम, रसातल भूमि भरे नृप कूर, कुसाहेब सेंतिहुँ खारे ॥

१११ उत्तरकाण्ड 'तुलसी' तेहि सेवत कौन मरै ? रजसें लघु को करै मेरुतें भारे ? स्वामि सुसील समर्थ सुजान, सो तो-सो तुहीं दसरथदुलारे ।१२। तुम्हारे खरीदने (अपना लेने) से जीव औरोंको भी खरीद (गुलाम बना) सकता है, और सब (अन्य देवता) तो खरीदकर बेच देनेवाले हैं। आकाश, रसातल और पृथ्वीमें अनेकों निर्दय राजा और दुष्ट स्वामी भरे पड़े हैं, किन्तु वे तो मुफ्तमें मिलें तो भी त्यागने योग्य ही हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि उनकी सेवा करके कौन मरे। धूलके समान लघु सेवकको सुमेरुसे भी बड़ा बनानेवाला (तुम्हारे सिवा और) कौन है? हे दशरथनन्दन ! तुम्हारे समान सुशील, समर्थ और सुजान स्वामी तो तुम्हीं हो। जातुधान, भालु, कपि, केवट, बिहंग जो-जो पाल्यो नाथ ! सद्य सो-सो भयो काम-काजको। आरत अनाथ दीन मलिन सरन आए, राखे अपनाइ, सो सुभाउ महाराजको ॥ नाम तुलसी, पै भाँडो भाँग तें, कहायो दासु, कियो अंगीकार ऐसे बड़े दगाबाजको। साहेबु समर्थ दसरथके ! दयालदेव दूसरो न तो-सो तुम्हीं आपनेकी लाजको ॥१३॥ हे नाथ ! आपने निशाचर, भालु, वानर, केवट, पक्षी— जिस-जिसको अपनाया वही तुरंत (निकम्मेसे) कामका हो गया। दुखी, अनाथ, दीन, मलिन—जो भी शरणमें आये उन्हींको आपने अपना लिया, ऐसा महाराजका स्वभाव है। नाम तो (मेरा) तुलसी है पर हूँ मैं भाँगसे भी बुरा और कहलाने लगा दास

कवितावली ११२ और आपने ऐसे दगाबाजको भी अङ्गीकार कर लिया। हे दशरथ- नन्दन ! आपके समान कोई दूसरा समर्थ स्वामी अथवा दयालु देव नहीं है; अपने शरणागतकी लज्जा रखनेवाले तो आप ही हैं। महाबली बालि दलि, कायर सुकंठ कपि सखा किए महाराज ! हो न काहू कामको। भ्रात-घात-पातकी निसाचर सरन आएँ, कियो अंगीकार नाथ ! एते बड़े बामको॥ राय दसरथके ! समर्थ तेरे नाम लिएँ, तुलसी-से क्रूरको कहत जगु रामको। आपने निवाजेकी तौ लाज महाराजको सुभाउ, समुझत मनु मुदित गुलामको ॥१४॥ हे महाराज ! आपने महाबलवान् बालिको मारकर कायर सुग्रीवको मित्र बनाया, जो किसी कामका नहीं था। भाईको धोखा देनेका पाप करनेवाले राक्षसको शरण आनेपर-इतना प्रतिकूल होते हुए भी-स्वीकार कर लिया। हे महाराज दशरथके समर्थ सपूत ! तुम्हारा नाम लेनेसे आज तुलसी-जैसे कपटीको भी लोग रामका कहते हैं। अपने अनुगृहीत दासकी लाज रखना तो महाराज- का स्वभाव ही है, यह समझकर सेवकका मन आनन्दित होता है। रूप-सीलसिंधु, गुनसिंधु, बंधु दीनको, दयानिधान, जानमनि, बीरबाहु-बोलको। स्राद्ध कियो गीधको, सराहे फल सबरीके, सिला-साप-समन, निबाह्यो नेहु कोलको ॥

११३ उत्तरकाण्ड तुलसी उराउ होत रामको सुभाउ सुनि, को न बलि जाइ, न बिकाइ बिनु मोल को। ऐसेहू सुसाहेबसों जाको अनुरागु न, सो बड़ोई अभागो, भागु भागो लोभ-लोलको ॥१५॥ भगवान् राम रूप और शीलके सागर, गुणोंके समुद्र, दीनोंके बन्धु, दयाके निधान, ज्ञानियोंमें शिरोमणि तथा वचन और बाहुबलमें शूरवीर हैं। उन्होंने गृध्रका श्राद्ध किया, शबरीके फलोंकी प्रशंसा की, शिला बनी हुई अहल्याके शापको शमन किया और भीलोंके साथ प्रेम निबाहा। गोसाईं जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रके स्वभावको सुनकर उत्साह होता है। उसपर कौन न्यौछावर नहीं होगा और कौन उसके हाथ बिना मोल नहीं बिक जायगा। ऐसे उत्तम स्वामी- से भी जिसे प्रीति नहीं है, वह बड़ा ही अभागा है और उस लोभ- से चलायमान मनुष्यका भाग्य ही उससे दूर भाग गया है। सूरसिरताज, महाराजनि के महाराज, जाको नामु लेतहीं सुखेतू होत ऊसरो। साहेबु कहाँ जहान जानकीसु सो सुजान, सुमिरें कृपालुके मरालु होत खूसरो ॥ केवट, पषान, जातुधान, कपि-भालु तारे, अपनायो तुलसी-सो धींग धमघूसरो। बोलको अटल, बाँहको पगारु, दीनबंधु, दूबरेको दानी, को दयानिधानु दूसरो ॥१६॥ क० ८-

कवितावली ११४ जो वीरोंके शिरोमणि और महाराजांके महाराज हैं, जिनका नाम लेते ही बंज़ड़ ज़मीन भी उपजाऊ हो जाती है, उन जानकी- पति ( श्रीराम ) के समान सुजान स्वामी संसारमें कौन है ? जिस कृपालुको स्मरण करनेसे ही उल्लू भी हंस हो जाता है । उन्होंने केवट, शिलारूप ( अहल्या ), राक्षस, वानर और भालुओंको तारा और तुलसी-से गँवार मुटुण्डेको भी अपना लिया । उनके समान बातका पक्का और भुजाओंका आश्रय देनेवाला तथा दुखियोंका सगा, दुर्बलोंका दानी और दयाका भण्डार दूसरा कौन है ? कीबेको बिसोक लोक लोकपाल हुते सब, कहूँ कोऊ भो न चरवाहो कपि-भालुको । पविकों पहारु कियो ख्याल ही कृपाल राम, बापुरो विभीषनु घरौंधा हुतो बालुको ॥ नाम-ओट लेत ही निखोट होत खोटे खल, चोट बिनु मोट पाइ भयो न निहालु को ? तुलसीकी बार बड़ी ढील होति, सीलसिंधु ! बिगरी सुधारिवेको दूसरो दयालु को ॥१७॥ लोकोंको शोकरहित करनेके लिये ( इन्द्रादिक ) सभी लोकपाल थे, परन्तु [ आजतक ] रीछ-वानरोंको खिलाने-पिलानेवाला कोई कहीं नहीं हुआ । बेचारा विभीषण जो बालूके घरौंदे ( खेलवाड़- के घर ) के समान निर्बल था उसे श्रीरामचन्द्रने सङ्कल्पमात्रसे वज्रके पहाड़ की तरह दुर्धर्ष बना दिया । खोटे और दुष्ट लोग भी उनके नामकी ओट लेते ही निर्दोष हो जाते हैं । भला, बिना परिश्रम

११९ | उत्तरकाण्ड (धनकी) गठरी पाकर कौन निहाल नहीं हुआ ? तुलसीदासजी कहते हैं, हे शीलसिन्धु ! मेरी वार बड़ी ढिलाई हो रही है । भला, बिगड़ीको बनानेवाला आपके सिवा दूसरा कौन कृपालु है ? नामु लिएँ पूतको पुनीत कियो पातकीस, आरति निवारी ‘प्रभु पाहि’ कहैं पीलकी । छलिन की छोंड़ी, सो निगोड़ी छोटी जाति-पाँति कीन्ही लीन आपुमें सुनारी भोंड़े भीलकी ॥ तुलसीऔ तारियो, बिसारियो न अंत मोहि, नीकें है प्रतीति रावरे सुभाव-सीलकी । देउ तौ दयानिकेत, देत दादि दीनन की, मेरी वार मेरें ही अभाग नाथ ढील की ॥१८॥ आपने पुत्रका नाम लेनेसे ही पातकियोंके सरदार (अजामिल) को पवित्र कर दिया और ‘रक्षा करो’ ऐसा कहते ही गजराजका दुःख दूर कर दिया। जो छलियोंकी लड़की, अभागी जाति-पाँतिमें छोटी तथा गँवार भीलकी स्त्री थी, उसे भी आपने अपनेमें लीन कर लिया। अब आप तुलसीको भी तार दें। अन्तमें मुझे ही न भूल जायँ। आपके शील-स्वभावका मुझे खूब भरोसा है। हे देव ! आप तो दयाधाम हैं, गरीबोंकी सदा ही सहायता करते हैं। हे नाथ ! अब मेरी बार मेरे ही दुर्भाग्यसे आपने ढिलाई की है। आगें परे पाहन कृपाँ किरात, कोलनी, कपीसु, निसिचरु अपनाए नाएँ माथ जू ।

कवितावली ११६ साँचौ सेवकाई हनुमान की सुजानराय, रिनियाँ कहाए हौ, बिकाने ताके हाथ जू ॥ तुलसी-से खोटे खरे होत ओट नामही कीं, तेजी माटी मगहू की मृगमद साथ जू । बात चलें बातको न मानिबो विलगु, बलि, काकीं सेवाँ रीझि कै नेवाजो रघुनाथ जू ? ॥१९॥ हे नाथ ! आपने कृपा करके अपने आगे पड़ी शिलको तथा किरात, भीलनी, सुग्रीव और केवल सिर नवानेसे ही राक्षस बिभीषणको अपना लिया । हे सुजानशिरोमणि ! सच्ची सेवा तो आपकी हनुमान्‌जीने की, जो आप उनके ऋणी कहलाये और उनके हाथ बिक गये । तुलसीके समान दम्भी भी आपके नामकी ओट लेनेसे ही सच्चे हो जाते हैं, जैसे रास्तेकी मिट्टी कस्तूरीके संसर्गसे बहुमूल्य हो जाती है । इस प्रसंगपर यदि मैं कोई बात पूछूँ तो बुरा न मानियेगा । हे रघुनाथजी ! मैं आपकी बलि जाता हूँ, भला, आपने किसकी सेवासे रीझकर कृपा की है ? [अर्थात् आपने अपनी कृपालुतासे ही अपने सेवकोंको बढ़ाया है, किसीने भी ऐसी सेवा नहीं की जिससे आप रीझ सकें ।] कौसिककी चलत, पषानकी परस पाय, टूटत धनुष बनि गई है जनककी । कोल, पसु, सबरी, बिहंग, भालु, रातिचर, रतिनके लालचिन त्रापति मनककी ॥ कोटि-कला-कुसल कृपाल नतपाल ! बलि, बातहू केतिक तिन तुलसी तनककी ।

११७ उत्तरकाण्ड गय दसरथ के समत्थ राम राजमनि ! तेरें हेरें लोपै लिपि बिधिहू गनककी ॥२०॥ विश्वामित्रजीकी बात (केवल साथ) चल देनेसे, शिला (बनी हुई अहल्या) की चरणस्पर्शमात्रसे और राजा जनककी धनुष- के टूटनेसे बन गयी। कोल, पशु (सुग्रीवादि वानर), शबरी, गीध (जटायु), भालु और (विभीषण आदि) राक्षसोंको रत्तीभरका लालच था, उनको मनभरकी प्राप्ति हो गयी (अर्थात् जितना वे चाहते थे उससे बहुत अधिक उन्हें मिल गया)। हे करोड़ों कलाओंमें कुशल एवं विनीतकी रक्षा करनेवाले दयालो ! आपकी बलिहारी है; तिनकेके समान तुच्छ इस तुलसीदासकी बात ही कितनी है। हे महाराज दशरथके समर्थ पुत्र राजशिरोमणि राम ! तुम्हारी दृष्टिमात्रसे ब्रह्मा-जैसे ज्योतिषीकी लिपि भी मिट जाती है। सिला-श्रापु पापु, गुह-गीधको मिलापु, सबरीके पास आपु चलि गए हौ, सो सुनी मैं। सेवक सराहे कपिनायकु विभीषनु भरतसभा सादर सनेह सुरधुनीमैं॥ आलसी-अभागी-अघी-आरत-अनाथपाल साहेबु समर्थ एकु, नीकें मन गुनी मैं। दोष-दुख-दारिद-दलैया दीनबंधु राम ! 'तुलसी' न दूसरो दयानिधानु दुनीमैं ॥२१॥ मैंने शिला (बनी हुई अहल्या) के शाप (और व्यभिचार- रूप) पाप, निषाद तथा गीध (जटायु) से मिलनेकी बात सुनी, और शबरीके पास स्वयं (बिना बुलाये) चले गये यह सभी मैं

कवितावली ११८ सुन चुका हूँ। आपने स्नेह एवं आदरपूर्वक भरतजीके सामने सभाके बीच अपने सेवक वानरराज (सुग्रीव) की और विभीषणकी गङ्गाके समान (पवित्र) कहकर प्रशंसा की। मैने मनमें अच्छी तरह विचार कर लिया कि आलसी, अभागे, पापी, आर्त और अनाथोंका पालन करनेवाले समर्थ साहब एक आप ही हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—दोष, दुःख और दरिद्रताका नाश करनेवाले हे दीनबन्धु राम ! आपके समान दयानिधान दुनियामें दूसरा नहीं है। मीतु बालिबंधु, पूतु दूतू, दसकंधबंधु सचिव, सराघु कियों सबरी-जटाइको। लंक जरी जोहैं जियँ सोचुसो विभीषनको, कहौ ऐसे साहेबकी सेवाँ न खटाइको॥ बड़े एक-एकतें अनेक लोक लोकपाल, अपने-अपनेको तौ कहैंगो घटाइको। साँकरेके सेइबे, सराहिवे, सुमिरबेको, रामु सो न साहेबु न कुमति-कटाइको ॥ २२ ॥ बालिके भाई (सुग्रीव) को अपना मित्र बनाया, उसके पुत्र (अङ्गद) को दूत बनाया, रावण (जैसे शत्रु) के भाई (विभीषण) को मन्त्री बनाया, जटायु और शबरीका श्राद्ध किया तथा लंकाको जली देख चित्तमें विभीषणके लिये चिन्ता-सी हुई, (कि जली हुई लंका मैंने इन्हें दी।) कहो, भला, ऐसे स्वामीकी सेवामें कौन नहीं निभ जायगा? अनेकों लोकोंमें वहाँके लोकपाल एक-से-एक बड़े हैं, अपने-अपने स्वामीको भला कौन घटाकर कहेगा। परन्तु दुःखमें सेवन करनेको, सराहनेको और स्मरण

११९ उत्तरकाण्ड करनेको, भगवान् रामके समान कुमतिकी निवृत्ति करनेवाला कोई दूसरा स्वामी नहीं है। भूमिपाल, व्यालपाल, नाकपाल, लोकपाल कारन कृपाल, मैं सबैके जीकी थाह ली। कादरको आदरु काहूकें नाहिं देखिअत, सबनि सोहात है सेवा-सुजानि टाहली ॥ तुलसी सुभायँ कहै, नाहीं कछु पच्छपातु, कौनैं ईस किए कीस-भालु खास माहली। रामही के द्वारे पै बोलाइ सनमानिअत मोसे दीन दूबरे कपूत क्रूर काहली ॥२३॥ पृथ्वीपति, नागपति, देवलोकोंके स्वामी और लोकपाल ये सब कारणवश कृपा करते हैं, मैं सभीके जीकी थाह ले चुका हूँ। कायरोंका आदर किसीके यहाँ देखनेमें नहीं आता; सबको सेवामें दक्ष सेवक सुहाते हैं । तुलसी सत्यभावसे कहता है, उसे कोई पक्षपात नहीं है - भला किस स्वामीने रीछ और वानरोंको अपना खास माहली (रनिवासका सेवक) बनाया है ? श्रीराम- चन्द्रहीके द्वारपर मेरे समान दीन, दुर्बल, कपूत, कायर और आलसीको बुलाकर सम्मान किया जाता है। सेवा अनुरूप फल देत भूप कूप ज्यों, बिहूने गुन पथिक पिआसे जात पथके । लेखें-जोखें चोखें चित 'तुलसी' स्वारथ हित, नीकें देखे देवता देवैया बने गथके ॥ गीधु मानो गुरु, कपि-भालु माने मीत कै,