भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 122

११९ उत्तरकाण्ड करनेको, भगवान् रामके समान कुमतिकी निवृत्ति करनेवाला कोई दूसरा स्वामी नहीं है। भूमिपाल, व्यालपाल, नाकपाल, लोकपाल कारन कृपाल, मैं सबैके जीकी थाह ली। कादरको आदरु काहूकें नाहिं देखिअत, सबनि सोहात है सेवा-सुजानि टाहली ॥ तुलसी सुभायँ कहै, नाहीं कछु पच्छपातु, कौनैं ईस किए कीस-भालु खास माहली। रामही के द्वारे पै बोलाइ सनमानिअत मोसे दीन दूबरे कपूत क्रूर काहली ॥२३॥ पृथ्वीपति, नागपति, देवलोकोंके स्वामी और लोकपाल ये सब कारणवश कृपा करते हैं, मैं सभीके जीकी थाह ले चुका हूँ। कायरोंका आदर किसीके यहाँ देखनेमें नहीं आता; सबको सेवामें दक्ष सेवक सुहाते हैं । तुलसी सत्यभावसे कहता है, उसे कोई पक्षपात नहीं है - भला किस स्वामीने रीछ और वानरोंको अपना खास माहली (रनिवासका सेवक) बनाया है ? श्रीराम- चन्द्रहीके द्वारपर मेरे समान दीन, दुर्बल, कपूत, कायर और आलसीको बुलाकर सम्मान किया जाता है। सेवा अनुरूप फल देत भूप कूप ज्यों, बिहूने गुन पथिक पिआसे जात पथके । लेखें-जोखें चोखें चित 'तुलसी' स्वारथ हित, नीकें देखे देवता देवैया बने गथके ॥ गीधु मानो गुरु, कपि-भालु माने मीत कै,