कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ११८ सुन चुका हूँ। आपने स्नेह एवं आदरपूर्वक भरतजीके सामने सभाके बीच अपने सेवक वानरराज (सुग्रीव) की और विभीषणकी गङ्गाके समान (पवित्र) कहकर प्रशंसा की। मैने मनमें अच्छी तरह विचार कर लिया कि आलसी, अभागे, पापी, आर्त और अनाथोंका पालन करनेवाले समर्थ साहब एक आप ही हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—दोष, दुःख और दरिद्रताका नाश करनेवाले हे दीनबन्धु राम ! आपके समान दयानिधान दुनियामें दूसरा नहीं है। मीतु बालिबंधु, पूतु दूतू, दसकंधबंधु सचिव, सराघु कियों सबरी-जटाइको। लंक जरी जोहैं जियँ सोचुसो विभीषनको, कहौ ऐसे साहेबकी सेवाँ न खटाइको॥ बड़े एक-एकतें अनेक लोक लोकपाल, अपने-अपनेको तौ कहैंगो घटाइको। साँकरेके सेइबे, सराहिवे, सुमिरबेको, रामु सो न साहेबु न कुमति-कटाइको ॥ २२ ॥ बालिके भाई (सुग्रीव) को अपना मित्र बनाया, उसके पुत्र (अङ्गद) को दूत बनाया, रावण (जैसे शत्रु) के भाई (विभीषण) को मन्त्री बनाया, जटायु और शबरीका श्राद्ध किया तथा लंकाको जली देख चित्तमें विभीषणके लिये चिन्ता-सी हुई, (कि जली हुई लंका मैंने इन्हें दी।) कहो, भला, ऐसे स्वामीकी सेवामें कौन नहीं निभ जायगा? अनेकों लोकोंमें वहाँके लोकपाल एक-से-एक बड़े हैं, अपने-अपने स्वामीको भला कौन घटाकर कहेगा। परन्तु दुःखमें सेवन करनेको, सराहनेको और स्मरण