कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ें११७ उत्तरकाण्ड गय दसरथ के समत्थ राम राजमनि ! तेरें हेरें लोपै लिपि बिधिहू गनककी ॥२०॥ विश्वामित्रजीकी बात (केवल साथ) चल देनेसे, शिला (बनी हुई अहल्या) की चरणस्पर्शमात्रसे और राजा जनककी धनुष- के टूटनेसे बन गयी। कोल, पशु (सुग्रीवादि वानर), शबरी, गीध (जटायु), भालु और (विभीषण आदि) राक्षसोंको रत्तीभरका लालच था, उनको मनभरकी प्राप्ति हो गयी (अर्थात् जितना वे चाहते थे उससे बहुत अधिक उन्हें मिल गया)। हे करोड़ों कलाओंमें कुशल एवं विनीतकी रक्षा करनेवाले दयालो ! आपकी बलिहारी है; तिनकेके समान तुच्छ इस तुलसीदासकी बात ही कितनी है। हे महाराज दशरथके समर्थ पुत्र राजशिरोमणि राम ! तुम्हारी दृष्टिमात्रसे ब्रह्मा-जैसे ज्योतिषीकी लिपि भी मिट जाती है। सिला-श्रापु पापु, गुह-गीधको मिलापु, सबरीके पास आपु चलि गए हौ, सो सुनी मैं। सेवक सराहे कपिनायकु विभीषनु भरतसभा सादर सनेह सुरधुनीमैं॥ आलसी-अभागी-अघी-आरत-अनाथपाल साहेबु समर्थ एकु, नीकें मन गुनी मैं। दोष-दुख-दारिद-दलैया दीनबंधु राम ! 'तुलसी' न दूसरो दयानिधानु दुनीमैं ॥२१॥ मैंने शिला (बनी हुई अहल्या) के शाप (और व्यभिचार- रूप) पाप, निषाद तथा गीध (जटायु) से मिलनेकी बात सुनी, और शबरीके पास स्वयं (बिना बुलाये) चले गये यह सभी मैं