कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुनीत गीत-साके सब साहेब समत्थके। और भूप परखि सुलाखि तौलि ताइ लेत, लसमके खसमु तुहीं पै दसरथके ॥२४॥ राजालोग कूपके समान सेवानुकूल फल देते हैं, बिना गुण (रस्सी) के पथके पथिक प्यासे चले जाते हैं [ तात्पर्य यह है कि जैसे बिना गुण (डोरी) के कूपसे जल नहीं आता वैसे ही बिना गुणके राजालोगोंसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता ] । गोसाईंजी कहते हैं, शुद्ध चित्तसे भलीभाँति हिसाब लगाकर देख लिया कि स्वार्थके लिये धन देनेवाले देवता तो बहुत-से हैं । परन्तु जिन्होंने गीधको गुरु (पिता) के समान माना और वानर-भालुओंको मित्र समझा ऐसे समर्थ स्वामीके सभी गीत और कीर्ति-कथाएँ पवित्र हैं । और जितने राजा हैं, वे सब तो (अपने सेवकोंको) अच्छी तरहसे जाँचकर, सूराख करके तौलकर तथा तपाकर लेते हैं*; परन्तु हे दशरथके राजकुमार ! निकम्मोंके प्रभु तो, बस आप ही हैं । केवल रामहीसे माँगो रीति महाराजकी, नेवाजिए जो माँगनो, सो दोष-दुख-दारिद दरिद्र कै-कै छोड़िए । नामु जाको कामतरु देत फल चारि, ताहि 'तुलसी' बिहाइ कै बबूर-रेंड़ गोड़िए ॥ जाचै को नरेस, देस-देसको कलेसु करै, दैहैं तौ प्रसंन ह्वै बड़ी बड़ाई बाँड़िए ।
- सोनेको परखनेवाले ये सब क्रियाएँ करते हैं ।