कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृपा-पाथनाथ लोकनाथ-नाथ सीतानाथ तजि रघुनाथ हाथ और काहि ओड़िये ॥२५॥ महाराजकी यह रीति है कि जिस याचकको अपनाते हैं उसके दोष, दुःख और दरिद्रताको दरिद्र ( क्षीण ) करके छोड़ते हैं । जिनका नामरूप कल्पवृक्ष चारों फलों ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) का देनेवाला है, गोसाईंजी कहते हैं, उन्हें त्याग कर बबूल और रेंड कौन रोपे ? राजाओंसे याचना कौन करे ? और देश- विदेश घूमनेका कष्ट कौन भोगे ? जो प्रसन्न होकर बहुत बढ़कर देंगे तो एक दमड़ीसे अधिक न देंगे, कृपाके समुद्र, लोकपालोंके स्वामी सीतानाथ श्रीरामचन्द्रजीको छोड़कर और किसके आगे हाथ फैलाया जाय ? जाकें बिलोकत लोकप होत, बिसोक लहैं सुरलोग सुठौरहि । सो कमला तजि चंचलता, करि कोटि कला रिझवै सुरमौरहि ॥ ताको कहाइ, कहै तुलसी, तूँ लजाहि न मागत कूकुर-कौरहि । जानकी जीवनको जनु है जरि जाउ सो जीह जो जाचत औरहि २६ जिसकी दृष्टिमात्रसे मनुष्य लोकपाल हो जाता है और देवतालोग सुन्दर शोकरहित स्थानको प्राप्त कर लेते हैं, वह लक्ष्मी ( अपनी स्वाभाविक ) चञ्चलता त्याग कर करोड़ों उपायों- से विष्णुरूप श्रीरामचन्द्रजीको रिझाती है; गोसाईंजी कहते हैं कि तू उनका कहलाकर कुत्तेको दिया जानेवाला टुकड़ा ( तुच्छ भोग ) माँगनेमें लज्जित नहीं होता । जानकीजीवन ( श्रीरामचन्द्र- जी ) का सेवक होकर भी जो दूसरेसे माँगता है, उसकी जीभ जल जाय ।