भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 228 में से

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पृष्ठ 112

१०९ उत्तरकाण्ड प्रभु सत्य करी प्रहलादगिरा, प्रगटे नरकेहरि खंभ महाँ । झषराज ग्रस्यो गजराज, कृपा ततकाल, बिलंबु कियो न तहाँ ॥ सुर साखि दै राखी है पांडुवधू पट लूटत, कोटिक भूप जहाँ । तुलसी ! भजु सोच विमोचनको, जनको पनु राम न राख्यो कहाँ ८ भगवान्‌ने प्रह्लादके वचनको सत्य किया और महान् खंभके बीचमेंसे नरसिंहरूपमें प्रकट हुए । जब ग्राहने गजको पकड़ा तो तत्काल ही कृपा की, ( जरा-सा भी ) विलम्ब नहीं किया । करोड़ों राजाओंके सामने जिसका वस्त्र लूटा जा रहा था, उस द्रौपदीकी देवताओंको साक्षी बनाकर रक्षा की । गोसाईंजी अपनेसे ही कहते हैं कि अरे तुलसीदास ! शोकसे छुड़ानेवाले श्रीरामचन्द्रको भज, उन्होंने सेवकके प्रणको कहाँ नहीं निबाहा ? नरनारि उघारि सभा महुँ होत दियो पटु, सोचु हर्यो मनको। प्रहलाद-बिषाद-निवारन, बारन-तारन, मीत अकारनको ॥ जो कहावत दीनदयाल सही, जेहि भारु सदा अपने पनको । 'तुलसी' तजि आन भरोस भजें, भगवानु भलो करिहैं जनको ९ नरावतार ( अर्जुन ) की स्त्री ( द्रौपदी ) सभामें नंगी की जा रही थी, उसे वस्त्र देकर उसके मनका सोच दूर किया। जो प्रह्लादके दुःखको दूर करनेवाले, गजको बचानेवाले, बिना कारणके मित्र और सच्चे दीनदयालु कहलाते हैं, जिनको अपने प्रणका सदैव भार ( ध्यान ) रहता है, गोसाईंजी कहते हैं कि औरोंका भरोसा त्याग कर उन भगवान्‌का भजन करनेसे वे अपने दासका भला करेंगेही । रिषिनारि उधारि, कियो सठ केवटु मीतु पुनीत, सुकीर्ति लही । निज लोकु दियो सबरी-खगको, कपि थाप्यो, सो मालुम है सबही॥

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