भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

कवितावली ११० दससीस-बिरोध सभीत विभीषनु भूपु कियो, जग लीक रही । करुनानिधिको भजु, रे तुलसी ! रघुनाथु अनाथके नाथु सही १० (भगवान् रामने) ऋषि (गौतम) की पत्नी (अहल्या) का उद्धार किया और दुष्ट केवटको मित्र बनाकर पवित्र कर दिया, और इस प्रकार सुकीर्ति प्राप्त की; शबरी और गीधको अपना लोक दिया और सुग्रीवको राज्यपर स्थापित किया, सो सबको मालूम ही है; रावणके विरोधसे डरे हुए विभीषणको राजा बनाया जिससे उनकी कीर्ति संसारभरमें छा गयी । गोसाईंजी कहते हैं 'अरे तुलसीदास ! करुणानिधि (श्रीरामचन्द्र) को भज, वे अनाथोंके सच्चे स्वामी हैं।' कौसिक, विप्रबधू, मिथिलाधिपके सब सोच दले पल माहैं । वालि-दसानन-बंधु-कथा-सुनि, सत्रु सुसाहेव-सीलु सराहैं ॥ ऐसी अनूप कहैं तुलसी रघुनायककी अगनी गुनगाहैं । आरत, दीन, अनाथनको रघुनाथु करैं निज हाथकी छाँहैं ॥११॥ (श्रीरघुनाथजीने) विश्वामित्र, ऋषिपत्नी (अहल्या) और मिथिलापति (महाराज जनक) की सभी चिन्ताओंको पलभरमें हर लिया । बालि और रावणके भाई (सुग्रीव और विभीषण) की कथा सुनकर शत्रु भी हमारे श्रेष्ठ स्वामी (श्रीरामचन्द्रजी) के शीलकी सराहना करते हैं । गोसाईंजी श्रीरघुनाथजीकी ऐसी अगणित अनुपम गुणगाथाएँ कहते हैं । आर्त्त, दीन और अनाथोंको रघुनाथजी अपने हाथकी छाया-तले कर लेते हैं । तेरे बेसाहें बेसाहत औरनि, और बेसाहि कै बेचनहारे । ब्योम, रसातल भूमि भरे नृप कूर, कुसाहेब सेंतिहुँ खारे ॥