भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 114

१११ उत्तरकाण्ड 'तुलसी' तेहि सेवत कौन मरै ? रजसें लघु को करै मेरुतें भारे ? स्वामि सुसील समर्थ सुजान, सो तो-सो तुहीं दसरथदुलारे ।१२। तुम्हारे खरीदने (अपना लेने) से जीव औरोंको भी खरीद (गुलाम बना) सकता है, और सब (अन्य देवता) तो खरीदकर बेच देनेवाले हैं। आकाश, रसातल और पृथ्वीमें अनेकों निर्दय राजा और दुष्ट स्वामी भरे पड़े हैं, किन्तु वे तो मुफ्तमें मिलें तो भी त्यागने योग्य ही हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि उनकी सेवा करके कौन मरे। धूलके समान लघु सेवकको सुमेरुसे भी बड़ा बनानेवाला (तुम्हारे सिवा और) कौन है? हे दशरथनन्दन ! तुम्हारे समान सुशील, समर्थ और सुजान स्वामी तो तुम्हीं हो। जातुधान, भालु, कपि, केवट, बिहंग जो-जो पाल्यो नाथ ! सद्य सो-सो भयो काम-काजको। आरत अनाथ दीन मलिन सरन आए, राखे अपनाइ, सो सुभाउ महाराजको ॥ नाम तुलसी, पै भाँडो भाँग तें, कहायो दासु, कियो अंगीकार ऐसे बड़े दगाबाजको। साहेबु समर्थ दसरथके ! दयालदेव दूसरो न तो-सो तुम्हीं आपनेकी लाजको ॥१३॥ हे नाथ ! आपने निशाचर, भालु, वानर, केवट, पक्षी— जिस-जिसको अपनाया वही तुरंत (निकम्मेसे) कामका हो गया। दुखी, अनाथ, दीन, मलिन—जो भी शरणमें आये उन्हींको आपने अपना लिया, ऐसा महाराजका स्वभाव है। नाम तो (मेरा) तुलसी है पर हूँ मैं भाँगसे भी बुरा और कहलाने लगा दास