भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

कवितावली ११२ और आपने ऐसे दगाबाजको भी अङ्गीकार कर लिया। हे दशरथ- नन्दन ! आपके समान कोई दूसरा समर्थ स्वामी अथवा दयालु देव नहीं है; अपने शरणागतकी लज्जा रखनेवाले तो आप ही हैं। महाबली बालि दलि, कायर सुकंठ कपि सखा किए महाराज ! हो न काहू कामको। भ्रात-घात-पातकी निसाचर सरन आएँ, कियो अंगीकार नाथ ! एते बड़े बामको॥ राय दसरथके ! समर्थ तेरे नाम लिएँ, तुलसी-से क्रूरको कहत जगु रामको। आपने निवाजेकी तौ लाज महाराजको सुभाउ, समुझत मनु मुदित गुलामको ॥१४॥ हे महाराज ! आपने महाबलवान् बालिको मारकर कायर सुग्रीवको मित्र बनाया, जो किसी कामका नहीं था। भाईको धोखा देनेका पाप करनेवाले राक्षसको शरण आनेपर-इतना प्रतिकूल होते हुए भी-स्वीकार कर लिया। हे महाराज दशरथके समर्थ सपूत ! तुम्हारा नाम लेनेसे आज तुलसी-जैसे कपटीको भी लोग रामका कहते हैं। अपने अनुगृहीत दासकी लाज रखना तो महाराज- का स्वभाव ही है, यह समझकर सेवकका मन आनन्दित होता है। रूप-सीलसिंधु, गुनसिंधु, बंधु दीनको, दयानिधान, जानमनि, बीरबाहु-बोलको। स्राद्ध कियो गीधको, सराहे फल सबरीके, सिला-साप-समन, निबाह्यो नेहु कोलको ॥