कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११३ उत्तरकाण्ड तुलसी उराउ होत रामको सुभाउ सुनि, को न बलि जाइ, न बिकाइ बिनु मोल को। ऐसेहू सुसाहेबसों जाको अनुरागु न, सो बड़ोई अभागो, भागु भागो लोभ-लोलको ॥१५॥ भगवान् राम रूप और शीलके सागर, गुणोंके समुद्र, दीनोंके बन्धु, दयाके निधान, ज्ञानियोंमें शिरोमणि तथा वचन और बाहुबलमें शूरवीर हैं। उन्होंने गृध्रका श्राद्ध किया, शबरीके फलोंकी प्रशंसा की, शिला बनी हुई अहल्याके शापको शमन किया और भीलोंके साथ प्रेम निबाहा। गोसाईं जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रके स्वभावको सुनकर उत्साह होता है। उसपर कौन न्यौछावर नहीं होगा और कौन उसके हाथ बिना मोल नहीं बिक जायगा। ऐसे उत्तम स्वामी- से भी जिसे प्रीति नहीं है, वह बड़ा ही अभागा है और उस लोभ- से चलायमान मनुष्यका भाग्य ही उससे दूर भाग गया है। सूरसिरताज, महाराजनि के महाराज, जाको नामु लेतहीं सुखेतू होत ऊसरो। साहेबु कहाँ जहान जानकीसु सो सुजान, सुमिरें कृपालुके मरालु होत खूसरो ॥ केवट, पषान, जातुधान, कपि-भालु तारे, अपनायो तुलसी-सो धींग धमघूसरो। बोलको अटल, बाँहको पगारु, दीनबंधु, दूबरेको दानी, को दयानिधानु दूसरो ॥१६॥ क० ८-