कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 117, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ११४ जो वीरोंके शिरोमणि और महाराजांके महाराज हैं, जिनका नाम लेते ही बंज़ड़ ज़मीन भी उपजाऊ हो जाती है, उन जानकी- पति ( श्रीराम ) के समान सुजान स्वामी संसारमें कौन है ? जिस कृपालुको स्मरण करनेसे ही उल्लू भी हंस हो जाता है । उन्होंने केवट, शिलारूप ( अहल्या ), राक्षस, वानर और भालुओंको तारा और तुलसी-से गँवार मुटुण्डेको भी अपना लिया । उनके समान बातका पक्का और भुजाओंका आश्रय देनेवाला तथा दुखियोंका सगा, दुर्बलोंका दानी और दयाका भण्डार दूसरा कौन है ? कीबेको बिसोक लोक लोकपाल हुते सब, कहूँ कोऊ भो न चरवाहो कपि-भालुको । पविकों पहारु कियो ख्याल ही कृपाल राम, बापुरो विभीषनु घरौंधा हुतो बालुको ॥ नाम-ओट लेत ही निखोट होत खोटे खल, चोट बिनु मोट पाइ भयो न निहालु को ? तुलसीकी बार बड़ी ढील होति, सीलसिंधु ! बिगरी सुधारिवेको दूसरो दयालु को ॥१७॥ लोकोंको शोकरहित करनेके लिये ( इन्द्रादिक ) सभी लोकपाल थे, परन्तु [ आजतक ] रीछ-वानरोंको खिलाने-पिलानेवाला कोई कहीं नहीं हुआ । बेचारा विभीषण जो बालूके घरौंदे ( खेलवाड़- के घर ) के समान निर्बल था उसे श्रीरामचन्द्रने सङ्कल्पमात्रसे वज्रके पहाड़ की तरह दुर्धर्ष बना दिया । खोटे और दुष्ट लोग भी उनके नामकी ओट लेते ही निर्दोष हो जाते हैं । भला, बिना परिश्रम