भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 118

११९ | उत्तरकाण्ड (धनकी) गठरी पाकर कौन निहाल नहीं हुआ ? तुलसीदासजी कहते हैं, हे शीलसिन्धु ! मेरी वार बड़ी ढिलाई हो रही है । भला, बिगड़ीको बनानेवाला आपके सिवा दूसरा कौन कृपालु है ? नामु लिएँ पूतको पुनीत कियो पातकीस, आरति निवारी ‘प्रभु पाहि’ कहैं पीलकी । छलिन की छोंड़ी, सो निगोड़ी छोटी जाति-पाँति कीन्ही लीन आपुमें सुनारी भोंड़े भीलकी ॥ तुलसीऔ तारियो, बिसारियो न अंत मोहि, नीकें है प्रतीति रावरे सुभाव-सीलकी । देउ तौ दयानिकेत, देत दादि दीनन की, मेरी वार मेरें ही अभाग नाथ ढील की ॥१८॥ आपने पुत्रका नाम लेनेसे ही पातकियोंके सरदार (अजामिल) को पवित्र कर दिया और ‘रक्षा करो’ ऐसा कहते ही गजराजका दुःख दूर कर दिया। जो छलियोंकी लड़की, अभागी जाति-पाँतिमें छोटी तथा गँवार भीलकी स्त्री थी, उसे भी आपने अपनेमें लीन कर लिया। अब आप तुलसीको भी तार दें। अन्तमें मुझे ही न भूल जायँ। आपके शील-स्वभावका मुझे खूब भरोसा है। हे देव ! आप तो दयाधाम हैं, गरीबोंकी सदा ही सहायता करते हैं। हे नाथ ! अब मेरी बार मेरे ही दुर्भाग्यसे आपने ढिलाई की है। आगें परे पाहन कृपाँ किरात, कोलनी, कपीसु, निसिचरु अपनाए नाएँ माथ जू ।