भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली १०८ कीस-निसाचरकी करनी न सुनी, न बिलोकी, न चित्त रही है। राम सदा सरनागतकी अनखौंही, अनैसी सुभायँ सही है ॥६॥ जिन्होंने अग्निकी अपवित्रता (दाहकता) को भी जला डाला (अर्थात् जिनका पवित्र स्पर्श पाकर अग्नि भी पवित्र और शीतल हो गयी) ऐसी नारीशिरोमणि जानकीजीको भी उन्होंने (लोकापवाद सुनकर) त्याग दिया; यही नहीं अपने धर्म-धुरन्धर बन्धु (लक्ष्मणजी) को (भी प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये) त्याग दिया और पुरजनोंको बुलाकर कर्तव्यका उपदेश दिया, किन्तु बंदर (सुग्रीवादि) और राक्षसों (विभीषणादि) की करनी (भ्रातृवधूसे भोग) को न तो सुना, न देखा और न चित्तमें ही रक्खा । इस प्रकार श्रीरामचन्द्रने अपने शरणागतोंकी क्रोध उत्पन्न करनेवाली बात और अनुचित बर्तावको भी सदा स्वभावसे ही सहा है । अपराध अगाध भएँ जनतें, अपनें उर आनत नाहिन जू । गनिका, गज, गीध, अजामिलके गनि पातकपुंज सिराहिं न जू ॥ लिएँ बारक नामु सुधाम् दियो, जेहिं धाम महामुनि जाहिं न जू । तुलसी ! भजु दीनदयालहि रे ! रघुनाथु अनाथहिदाहिन जू ।७। सेवकोंसे भारी-भारी अपराध हो जानेपर भी आप उन्हें अपने मनमें नहीं लाते (उनपर ध्यान नहीं देते) । गणिका, गज, गीध और अजामिलके पातकपुंज गिननेपर समाप्त होनेवाले नहीं थे; किन्तु उन्हें एक बार नाम लेनेसे भी वह परमधाम दिया, जिसमें महामुनि भी नहीं जा सकते । गोसाईंजी अपनेसे ही कहते हैं कि अरे तुलसीदास ! दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजीको भज; वे अनाथोंके अनुकूल (सहायक) हैं ।