भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

१०७ उत्तरकाण्ड आपने शोकरूपी समुद्रमें डूबते हुए सुग्रीवको निकालकर जिस प्रकार वानरोंका राजा बनाया, जो सारा संसार जानता है। नीच निशाचर और अपने शत्रुके भाई विभीषणको इन्द्रके समान (ऐश्वर्यशाली) बना दिया। केवल नाम लेनेसे ही तुलसी-जैसेको भी अपना लिया, जिसके समान बुरा संसारमें, कहो, दूसरा कौन है ? भगवान् राम ही दुखियोंके दुःखको दूर करनेवाले हैं; उनके-जैसा कोई दूसरा गरीबनिवाज नहीं है। मीत पुनीत कियो कपि-भालुको, पाल्यो ज्यों काहुँ न बाल तनूजौ। सज्जन-सींव बिभीषनु भो, अजहूँ बिलसै बर बंधुबधू जो॥ कोसलपाल बिना 'तुलसी' सरनागतपाल कृपाल न दूजो। क्रूर, कुजाति, कपूत, अघी, सबकी सुधरै, जो करै नरु पूजो ॥५॥ (उन्होंने) वानर और भालुओंतकको अपना पवित्र मित्र बनाया और उनकी ऐसी रक्षा की जैसी कोई अपने बालक पुत्र- की भी नहीं करेगा। और वे विभीषण, जो (चिरंजीवी होनेके कारण) आजतक अपने बड़े भाईकी स्त्री (मन्दोदरी) का उपभोग करते हैं, साधुताकी सीमा बन गये। गोसाईं जी कहते हैं कि कोसलेश्वर श्रीरामचन्द्रजीके अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा कृपालु और शरणागतोंकी रक्षा करनेवाला नहीं है। जो मनुष्य उनकी पूजा करते हैं उन सभीकी बन जाती है, चाहे वे क्रूर, कुजाति, कपूत और पापी ही क्यों न हों। तीय सिरोमनि सीय तजी, जेँहि पावककी कलुषाई दही है। धर्मधुरंधर बंधु तज्यो, पुरलोगनि की बिधि बोलि कही है॥