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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

१०७ उत्तरकाण्ड आपने शोकरूपी समुद्रमें डूबते हुए सुग्रीवको निकालकर जिस प्रकार वानरोंका राजा बनाया, जो सारा संसार जानता है। नीच निशाचर और अपने शत्रुके भाई विभीषणको इन्द्रके समान (ऐश्वर्यशाली) बना दिया। केवल नाम लेनेसे ही तुलसी-जैसेको भी अपना लिया, जिसके समान बुरा संसारमें, कहो, दूसरा कौन है ? भगवान् राम ही दुखियोंके दुःखको दूर करनेवाले हैं; उनके-जैसा कोई दूसरा गरीबनिवाज नहीं है। मीत पुनीत कियो कपि-भालुको, पाल्यो ज्यों काहुँ न बाल तनूजौ। सज्जन-सींव बिभीषनु भो, अजहूँ बिलसै बर बंधुबधू जो॥ कोसलपाल बिना 'तुलसी' सरनागतपाल कृपाल न दूजो। क्रूर, कुजाति, कपूत, अघी, सबकी सुधरै, जो करै नरु पूजो ॥५॥ (उन्होंने) वानर और भालुओंतकको अपना पवित्र मित्र बनाया और उनकी ऐसी रक्षा की जैसी कोई अपने बालक पुत्र- की भी नहीं करेगा। और वे विभीषण, जो (चिरंजीवी होनेके कारण) आजतक अपने बड़े भाईकी स्त्री (मन्दोदरी) का उपभोग करते हैं, साधुताकी सीमा बन गये। गोसाईं जी कहते हैं कि कोसलेश्वर श्रीरामचन्द्रजीके अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा कृपालु और शरणागतोंकी रक्षा करनेवाला नहीं है। जो मनुष्य उनकी पूजा करते हैं उन सभीकी बन जाती है, चाहे वे क्रूर, कुजाति, कपूत और पापी ही क्यों न हों। तीय सिरोमनि सीय तजी, जेँहि पावककी कलुषाई दही है। धर्मधुरंधर बंधु तज्यो, पुरलोगनि की बिधि बोलि कही है॥

कवितावली १०८ कीस-निसाचरकी करनी न सुनी, न बिलोकी, न चित्त रही है। राम सदा सरनागतकी अनखौंही, अनैसी सुभायँ सही है ॥६॥ जिन्होंने अग्निकी अपवित्रता (दाहकता) को भी जला डाला (अर्थात् जिनका पवित्र स्पर्श पाकर अग्नि भी पवित्र और शीतल हो गयी) ऐसी नारीशिरोमणि जानकीजीको भी उन्होंने (लोकापवाद सुनकर) त्याग दिया; यही नहीं अपने धर्म-धुरन्धर बन्धु (लक्ष्मणजी) को (भी प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये) त्याग दिया और पुरजनोंको बुलाकर कर्तव्यका उपदेश दिया, किन्तु बंदर (सुग्रीवादि) और राक्षसों (विभीषणादि) की करनी (भ्रातृवधूसे भोग) को न तो सुना, न देखा और न चित्तमें ही रक्खा । इस प्रकार श्रीरामचन्द्रने अपने शरणागतोंकी क्रोध उत्पन्न करनेवाली बात और अनुचित बर्तावको भी सदा स्वभावसे ही सहा है । अपराध अगाध भएँ जनतें, अपनें उर आनत नाहिन जू । गनिका, गज, गीध, अजामिलके गनि पातकपुंज सिराहिं न जू ॥ लिएँ बारक नामु सुधाम् दियो, जेहिं धाम महामुनि जाहिं न जू । तुलसी ! भजु दीनदयालहि रे ! रघुनाथु अनाथहिदाहिन जू ।७। सेवकोंसे भारी-भारी अपराध हो जानेपर भी आप उन्हें अपने मनमें नहीं लाते (उनपर ध्यान नहीं देते) । गणिका, गज, गीध और अजामिलके पातकपुंज गिननेपर समाप्त होनेवाले नहीं थे; किन्तु उन्हें एक बार नाम लेनेसे भी वह परमधाम दिया, जिसमें महामुनि भी नहीं जा सकते । गोसाईंजी अपनेसे ही कहते हैं कि अरे तुलसीदास ! दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजीको भज; वे अनाथोंके अनुकूल (सहायक) हैं ।

१०९ उत्तरकाण्ड प्रभु सत्य करी प्रहलादगिरा, प्रगटे नरकेहरि खंभ महाँ । झषराज ग्रस्यो गजराज, कृपा ततकाल, बिलंबु कियो न तहाँ ॥ सुर साखि दै राखी है पांडुवधू पट लूटत, कोटिक भूप जहाँ । तुलसी ! भजु सोच विमोचनको, जनको पनु राम न राख्यो कहाँ ८ भगवान्‌ने प्रह्लादके वचनको सत्य किया और महान् खंभके बीचमेंसे नरसिंहरूपमें प्रकट हुए । जब ग्राहने गजको पकड़ा तो तत्काल ही कृपा की, ( जरा-सा भी ) विलम्ब नहीं किया । करोड़ों राजाओंके सामने जिसका वस्त्र लूटा जा रहा था, उस द्रौपदीकी देवताओंको साक्षी बनाकर रक्षा की । गोसाईंजी अपनेसे ही कहते हैं कि अरे तुलसीदास ! शोकसे छुड़ानेवाले श्रीरामचन्द्रको भज, उन्होंने सेवकके प्रणको कहाँ नहीं निबाहा ? नरनारि उघारि सभा महुँ होत दियो पटु, सोचु हर्यो मनको। प्रहलाद-बिषाद-निवारन, बारन-तारन, मीत अकारनको ॥ जो कहावत दीनदयाल सही, जेहि भारु सदा अपने पनको । 'तुलसी' तजि आन भरोस भजें, भगवानु भलो करिहैं जनको ९ नरावतार ( अर्जुन ) की स्त्री ( द्रौपदी ) सभामें नंगी की जा रही थी, उसे वस्त्र देकर उसके मनका सोच दूर किया। जो प्रह्लादके दुःखको दूर करनेवाले, गजको बचानेवाले, बिना कारणके मित्र और सच्चे दीनदयालु कहलाते हैं, जिनको अपने प्रणका सदैव भार ( ध्यान ) रहता है, गोसाईंजी कहते हैं कि औरोंका भरोसा त्याग कर उन भगवान्‌का भजन करनेसे वे अपने दासका भला करेंगेही । रिषिनारि उधारि, कियो सठ केवटु मीतु पुनीत, सुकीर्ति लही । निज लोकु दियो सबरी-खगको, कपि थाप्यो, सो मालुम है सबही॥

कवितावली ११० दससीस-बिरोध सभीत विभीषनु भूपु कियो, जग लीक रही । करुनानिधिको भजु, रे तुलसी ! रघुनाथु अनाथके नाथु सही १० (भगवान् रामने) ऋषि (गौतम) की पत्नी (अहल्या) का उद्धार किया और दुष्ट केवटको मित्र बनाकर पवित्र कर दिया, और इस प्रकार सुकीर्ति प्राप्त की; शबरी और गीधको अपना लोक दिया और सुग्रीवको राज्यपर स्थापित किया, सो सबको मालूम ही है; रावणके विरोधसे डरे हुए विभीषणको राजा बनाया जिससे उनकी कीर्ति संसारभरमें छा गयी । गोसाईंजी कहते हैं 'अरे तुलसीदास ! करुणानिधि (श्रीरामचन्द्र) को भज, वे अनाथोंके सच्चे स्वामी हैं।' कौसिक, विप्रबधू, मिथिलाधिपके सब सोच दले पल माहैं । वालि-दसानन-बंधु-कथा-सुनि, सत्रु सुसाहेव-सीलु सराहैं ॥ ऐसी अनूप कहैं तुलसी रघुनायककी अगनी गुनगाहैं । आरत, दीन, अनाथनको रघुनाथु करैं निज हाथकी छाँहैं ॥११॥ (श्रीरघुनाथजीने) विश्वामित्र, ऋषिपत्नी (अहल्या) और मिथिलापति (महाराज जनक) की सभी चिन्ताओंको पलभरमें हर लिया । बालि और रावणके भाई (सुग्रीव और विभीषण) की कथा सुनकर शत्रु भी हमारे श्रेष्ठ स्वामी (श्रीरामचन्द्रजी) के शीलकी सराहना करते हैं । गोसाईंजी श्रीरघुनाथजीकी ऐसी अगणित अनुपम गुणगाथाएँ कहते हैं । आर्त्त, दीन और अनाथोंको रघुनाथजी अपने हाथकी छाया-तले कर लेते हैं । तेरे बेसाहें बेसाहत औरनि, और बेसाहि कै बेचनहारे । ब्योम, रसातल भूमि भरे नृप कूर, कुसाहेब सेंतिहुँ खारे ॥

१११ उत्तरकाण्ड 'तुलसी' तेहि सेवत कौन मरै ? रजसें लघु को करै मेरुतें भारे ? स्वामि सुसील समर्थ सुजान, सो तो-सो तुहीं दसरथदुलारे ।१२। तुम्हारे खरीदने (अपना लेने) से जीव औरोंको भी खरीद (गुलाम बना) सकता है, और सब (अन्य देवता) तो खरीदकर बेच देनेवाले हैं। आकाश, रसातल और पृथ्वीमें अनेकों निर्दय राजा और दुष्ट स्वामी भरे पड़े हैं, किन्तु वे तो मुफ्तमें मिलें तो भी त्यागने योग्य ही हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि उनकी सेवा करके कौन मरे। धूलके समान लघु सेवकको सुमेरुसे भी बड़ा बनानेवाला (तुम्हारे सिवा और) कौन है? हे दशरथनन्दन ! तुम्हारे समान सुशील, समर्थ और सुजान स्वामी तो तुम्हीं हो। जातुधान, भालु, कपि, केवट, बिहंग जो-जो पाल्यो नाथ ! सद्य सो-सो भयो काम-काजको। आरत अनाथ दीन मलिन सरन आए, राखे अपनाइ, सो सुभाउ महाराजको ॥ नाम तुलसी, पै भाँडो भाँग तें, कहायो दासु, कियो अंगीकार ऐसे बड़े दगाबाजको। साहेबु समर्थ दसरथके ! दयालदेव दूसरो न तो-सो तुम्हीं आपनेकी लाजको ॥१३॥ हे नाथ ! आपने निशाचर, भालु, वानर, केवट, पक्षी— जिस-जिसको अपनाया वही तुरंत (निकम्मेसे) कामका हो गया। दुखी, अनाथ, दीन, मलिन—जो भी शरणमें आये उन्हींको आपने अपना लिया, ऐसा महाराजका स्वभाव है। नाम तो (मेरा) तुलसी है पर हूँ मैं भाँगसे भी बुरा और कहलाने लगा दास

कवितावली ११२ और आपने ऐसे दगाबाजको भी अङ्गीकार कर लिया। हे दशरथ- नन्दन ! आपके समान कोई दूसरा समर्थ स्वामी अथवा दयालु देव नहीं है; अपने शरणागतकी लज्जा रखनेवाले तो आप ही हैं। महाबली बालि दलि, कायर सुकंठ कपि सखा किए महाराज ! हो न काहू कामको। भ्रात-घात-पातकी निसाचर सरन आएँ, कियो अंगीकार नाथ ! एते बड़े बामको॥ राय दसरथके ! समर्थ तेरे नाम लिएँ, तुलसी-से क्रूरको कहत जगु रामको। आपने निवाजेकी तौ लाज महाराजको सुभाउ, समुझत मनु मुदित गुलामको ॥१४॥ हे महाराज ! आपने महाबलवान् बालिको मारकर कायर सुग्रीवको मित्र बनाया, जो किसी कामका नहीं था। भाईको धोखा देनेका पाप करनेवाले राक्षसको शरण आनेपर-इतना प्रतिकूल होते हुए भी-स्वीकार कर लिया। हे महाराज दशरथके समर्थ सपूत ! तुम्हारा नाम लेनेसे आज तुलसी-जैसे कपटीको भी लोग रामका कहते हैं। अपने अनुगृहीत दासकी लाज रखना तो महाराज- का स्वभाव ही है, यह समझकर सेवकका मन आनन्दित होता है। रूप-सीलसिंधु, गुनसिंधु, बंधु दीनको, दयानिधान, जानमनि, बीरबाहु-बोलको। स्राद्ध कियो गीधको, सराहे फल सबरीके, सिला-साप-समन, निबाह्यो नेहु कोलको ॥

११३ उत्तरकाण्ड तुलसी उराउ होत रामको सुभाउ सुनि, को न बलि जाइ, न बिकाइ बिनु मोल को। ऐसेहू सुसाहेबसों जाको अनुरागु न, सो बड़ोई अभागो, भागु भागो लोभ-लोलको ॥१५॥ भगवान् राम रूप और शीलके सागर, गुणोंके समुद्र, दीनोंके बन्धु, दयाके निधान, ज्ञानियोंमें शिरोमणि तथा वचन और बाहुबलमें शूरवीर हैं। उन्होंने गृध्रका श्राद्ध किया, शबरीके फलोंकी प्रशंसा की, शिला बनी हुई अहल्याके शापको शमन किया और भीलोंके साथ प्रेम निबाहा। गोसाईं जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रके स्वभावको सुनकर उत्साह होता है। उसपर कौन न्यौछावर नहीं होगा और कौन उसके हाथ बिना मोल नहीं बिक जायगा। ऐसे उत्तम स्वामी- से भी जिसे प्रीति नहीं है, वह बड़ा ही अभागा है और उस लोभ- से चलायमान मनुष्यका भाग्य ही उससे दूर भाग गया है। सूरसिरताज, महाराजनि के महाराज, जाको नामु लेतहीं सुखेतू होत ऊसरो। साहेबु कहाँ जहान जानकीसु सो सुजान, सुमिरें कृपालुके मरालु होत खूसरो ॥ केवट, पषान, जातुधान, कपि-भालु तारे, अपनायो तुलसी-सो धींग धमघूसरो। बोलको अटल, बाँहको पगारु, दीनबंधु, दूबरेको दानी, को दयानिधानु दूसरो ॥१६॥ क० ८-

कवितावली ११४ जो वीरोंके शिरोमणि और महाराजांके महाराज हैं, जिनका नाम लेते ही बंज़ड़ ज़मीन भी उपजाऊ हो जाती है, उन जानकी- पति ( श्रीराम ) के समान सुजान स्वामी संसारमें कौन है ? जिस कृपालुको स्मरण करनेसे ही उल्लू भी हंस हो जाता है । उन्होंने केवट, शिलारूप ( अहल्या ), राक्षस, वानर और भालुओंको तारा और तुलसी-से गँवार मुटुण्डेको भी अपना लिया । उनके समान बातका पक्का और भुजाओंका आश्रय देनेवाला तथा दुखियोंका सगा, दुर्बलोंका दानी और दयाका भण्डार दूसरा कौन है ? कीबेको बिसोक लोक लोकपाल हुते सब, कहूँ कोऊ भो न चरवाहो कपि-भालुको । पविकों पहारु कियो ख्याल ही कृपाल राम, बापुरो विभीषनु घरौंधा हुतो बालुको ॥ नाम-ओट लेत ही निखोट होत खोटे खल, चोट बिनु मोट पाइ भयो न निहालु को ? तुलसीकी बार बड़ी ढील होति, सीलसिंधु ! बिगरी सुधारिवेको दूसरो दयालु को ॥१७॥ लोकोंको शोकरहित करनेके लिये ( इन्द्रादिक ) सभी लोकपाल थे, परन्तु [ आजतक ] रीछ-वानरोंको खिलाने-पिलानेवाला कोई कहीं नहीं हुआ । बेचारा विभीषण जो बालूके घरौंदे ( खेलवाड़- के घर ) के समान निर्बल था उसे श्रीरामचन्द्रने सङ्कल्पमात्रसे वज्रके पहाड़ की तरह दुर्धर्ष बना दिया । खोटे और दुष्ट लोग भी उनके नामकी ओट लेते ही निर्दोष हो जाते हैं । भला, बिना परिश्रम

११९ | उत्तरकाण्ड (धनकी) गठरी पाकर कौन निहाल नहीं हुआ ? तुलसीदासजी कहते हैं, हे शीलसिन्धु ! मेरी वार बड़ी ढिलाई हो रही है । भला, बिगड़ीको बनानेवाला आपके सिवा दूसरा कौन कृपालु है ? नामु लिएँ पूतको पुनीत कियो पातकीस, आरति निवारी ‘प्रभु पाहि’ कहैं पीलकी । छलिन की छोंड़ी, सो निगोड़ी छोटी जाति-पाँति कीन्ही लीन आपुमें सुनारी भोंड़े भीलकी ॥ तुलसीऔ तारियो, बिसारियो न अंत मोहि, नीकें है प्रतीति रावरे सुभाव-सीलकी । देउ तौ दयानिकेत, देत दादि दीनन की, मेरी वार मेरें ही अभाग नाथ ढील की ॥१८॥ आपने पुत्रका नाम लेनेसे ही पातकियोंके सरदार (अजामिल) को पवित्र कर दिया और ‘रक्षा करो’ ऐसा कहते ही गजराजका दुःख दूर कर दिया। जो छलियोंकी लड़की, अभागी जाति-पाँतिमें छोटी तथा गँवार भीलकी स्त्री थी, उसे भी आपने अपनेमें लीन कर लिया। अब आप तुलसीको भी तार दें। अन्तमें मुझे ही न भूल जायँ। आपके शील-स्वभावका मुझे खूब भरोसा है। हे देव ! आप तो दयाधाम हैं, गरीबोंकी सदा ही सहायता करते हैं। हे नाथ ! अब मेरी बार मेरे ही दुर्भाग्यसे आपने ढिलाई की है। आगें परे पाहन कृपाँ किरात, कोलनी, कपीसु, निसिचरु अपनाए नाएँ माथ जू ।

कवितावली ११६ साँचौ सेवकाई हनुमान की सुजानराय, रिनियाँ कहाए हौ, बिकाने ताके हाथ जू ॥ तुलसी-से खोटे खरे होत ओट नामही कीं, तेजी माटी मगहू की मृगमद साथ जू । बात चलें बातको न मानिबो विलगु, बलि, काकीं सेवाँ रीझि कै नेवाजो रघुनाथ जू ? ॥१९॥ हे नाथ ! आपने कृपा करके अपने आगे पड़ी शिलको तथा किरात, भीलनी, सुग्रीव और केवल सिर नवानेसे ही राक्षस बिभीषणको अपना लिया । हे सुजानशिरोमणि ! सच्ची सेवा तो आपकी हनुमान्‌जीने की, जो आप उनके ऋणी कहलाये और उनके हाथ बिक गये । तुलसीके समान दम्भी भी आपके नामकी ओट लेनेसे ही सच्चे हो जाते हैं, जैसे रास्तेकी मिट्टी कस्तूरीके संसर्गसे बहुमूल्य हो जाती है । इस प्रसंगपर यदि मैं कोई बात पूछूँ तो बुरा न मानियेगा । हे रघुनाथजी ! मैं आपकी बलि जाता हूँ, भला, आपने किसकी सेवासे रीझकर कृपा की है ? [अर्थात् आपने अपनी कृपालुतासे ही अपने सेवकोंको बढ़ाया है, किसीने भी ऐसी सेवा नहीं की जिससे आप रीझ सकें ।] कौसिककी चलत, पषानकी परस पाय, टूटत धनुष बनि गई है जनककी । कोल, पसु, सबरी, बिहंग, भालु, रातिचर, रतिनके लालचिन त्रापति मनककी ॥ कोटि-कला-कुसल कृपाल नतपाल ! बलि, बातहू केतिक तिन तुलसी तनककी ।

११७ उत्तरकाण्ड गय दसरथ के समत्थ राम राजमनि ! तेरें हेरें लोपै लिपि बिधिहू गनककी ॥२०॥ विश्वामित्रजीकी बात (केवल साथ) चल देनेसे, शिला (बनी हुई अहल्या) की चरणस्पर्शमात्रसे और राजा जनककी धनुष- के टूटनेसे बन गयी। कोल, पशु (सुग्रीवादि वानर), शबरी, गीध (जटायु), भालु और (विभीषण आदि) राक्षसोंको रत्तीभरका लालच था, उनको मनभरकी प्राप्ति हो गयी (अर्थात् जितना वे चाहते थे उससे बहुत अधिक उन्हें मिल गया)। हे करोड़ों कलाओंमें कुशल एवं विनीतकी रक्षा करनेवाले दयालो ! आपकी बलिहारी है; तिनकेके समान तुच्छ इस तुलसीदासकी बात ही कितनी है। हे महाराज दशरथके समर्थ पुत्र राजशिरोमणि राम ! तुम्हारी दृष्टिमात्रसे ब्रह्मा-जैसे ज्योतिषीकी लिपि भी मिट जाती है। सिला-श्रापु पापु, गुह-गीधको मिलापु, सबरीके पास आपु चलि गए हौ, सो सुनी मैं। सेवक सराहे कपिनायकु विभीषनु भरतसभा सादर सनेह सुरधुनीमैं॥ आलसी-अभागी-अघी-आरत-अनाथपाल साहेबु समर्थ एकु, नीकें मन गुनी मैं। दोष-दुख-दारिद-दलैया दीनबंधु राम ! 'तुलसी' न दूसरो दयानिधानु दुनीमैं ॥२१॥ मैंने शिला (बनी हुई अहल्या) के शाप (और व्यभिचार- रूप) पाप, निषाद तथा गीध (जटायु) से मिलनेकी बात सुनी, और शबरीके पास स्वयं (बिना बुलाये) चले गये यह सभी मैं

कवितावली ११८ सुन चुका हूँ। आपने स्नेह एवं आदरपूर्वक भरतजीके सामने सभाके बीच अपने सेवक वानरराज (सुग्रीव) की और विभीषणकी गङ्गाके समान (पवित्र) कहकर प्रशंसा की। मैने मनमें अच्छी तरह विचार कर लिया कि आलसी, अभागे, पापी, आर्त और अनाथोंका पालन करनेवाले समर्थ साहब एक आप ही हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—दोष, दुःख और दरिद्रताका नाश करनेवाले हे दीनबन्धु राम ! आपके समान दयानिधान दुनियामें दूसरा नहीं है। मीतु बालिबंधु, पूतु दूतू, दसकंधबंधु सचिव, सराघु कियों सबरी-जटाइको। लंक जरी जोहैं जियँ सोचुसो विभीषनको, कहौ ऐसे साहेबकी सेवाँ न खटाइको॥ बड़े एक-एकतें अनेक लोक लोकपाल, अपने-अपनेको तौ कहैंगो घटाइको। साँकरेके सेइबे, सराहिवे, सुमिरबेको, रामु सो न साहेबु न कुमति-कटाइको ॥ २२ ॥ बालिके भाई (सुग्रीव) को अपना मित्र बनाया, उसके पुत्र (अङ्गद) को दूत बनाया, रावण (जैसे शत्रु) के भाई (विभीषण) को मन्त्री बनाया, जटायु और शबरीका श्राद्ध किया तथा लंकाको जली देख चित्तमें विभीषणके लिये चिन्ता-सी हुई, (कि जली हुई लंका मैंने इन्हें दी।) कहो, भला, ऐसे स्वामीकी सेवामें कौन नहीं निभ जायगा? अनेकों लोकोंमें वहाँके लोकपाल एक-से-एक बड़े हैं, अपने-अपने स्वामीको भला कौन घटाकर कहेगा। परन्तु दुःखमें सेवन करनेको, सराहनेको और स्मरण

११९ उत्तरकाण्ड करनेको, भगवान् रामके समान कुमतिकी निवृत्ति करनेवाला कोई दूसरा स्वामी नहीं है। भूमिपाल, व्यालपाल, नाकपाल, लोकपाल कारन कृपाल, मैं सबैके जीकी थाह ली। कादरको आदरु काहूकें नाहिं देखिअत, सबनि सोहात है सेवा-सुजानि टाहली ॥ तुलसी सुभायँ कहै, नाहीं कछु पच्छपातु, कौनैं ईस किए कीस-भालु खास माहली। रामही के द्वारे पै बोलाइ सनमानिअत मोसे दीन दूबरे कपूत क्रूर काहली ॥२३॥ पृथ्वीपति, नागपति, देवलोकोंके स्वामी और लोकपाल ये सब कारणवश कृपा करते हैं, मैं सभीके जीकी थाह ले चुका हूँ। कायरोंका आदर किसीके यहाँ देखनेमें नहीं आता; सबको सेवामें दक्ष सेवक सुहाते हैं । तुलसी सत्यभावसे कहता है, उसे कोई पक्षपात नहीं है - भला किस स्वामीने रीछ और वानरोंको अपना खास माहली (रनिवासका सेवक) बनाया है ? श्रीराम- चन्द्रहीके द्वारपर मेरे समान दीन, दुर्बल, कपूत, कायर और आलसीको बुलाकर सम्मान किया जाता है। सेवा अनुरूप फल देत भूप कूप ज्यों, बिहूने गुन पथिक पिआसे जात पथके । लेखें-जोखें चोखें चित 'तुलसी' स्वारथ हित, नीकें देखे देवता देवैया बने गथके ॥ गीधु मानो गुरु, कपि-भालु माने मीत कै,

पुनीत गीत-साके सब साहेब समत्थके। और भूप परखि सुलाखि तौलि ताइ लेत, लसमके खसमु तुहीं पै दसरथके ॥२४॥ राजालोग कूपके समान सेवानुकूल फल देते हैं, बिना गुण (रस्सी) के पथके पथिक प्यासे चले जाते हैं [ तात्पर्य यह है कि जैसे बिना गुण (डोरी) के कूपसे जल नहीं आता वैसे ही बिना गुणके राजालोगोंसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता ] । गोसाईंजी कहते हैं, शुद्ध चित्तसे भलीभाँति हिसाब लगाकर देख लिया कि स्वार्थके लिये धन देनेवाले देवता तो बहुत-से हैं । परन्तु जिन्होंने गीधको गुरु (पिता) के समान माना और वानर-भालुओंको मित्र समझा ऐसे समर्थ स्वामीके सभी गीत और कीर्ति-कथाएँ पवित्र हैं । और जितने राजा हैं, वे सब तो (अपने सेवकोंको) अच्छी तरहसे जाँचकर, सूराख करके तौलकर तथा तपाकर लेते हैं*; परन्तु हे दशरथके राजकुमार ! निकम्मोंके प्रभु तो, बस आप ही हैं । केवल रामहीसे माँगो रीति महाराजकी, नेवाजिए जो माँगनो, सो दोष-दुख-दारिद दरिद्र कै-कै छोड़िए । नामु जाको कामतरु देत फल चारि, ताहि 'तुलसी' बिहाइ कै बबूर-रेंड़ गोड़िए ॥ जाचै को नरेस, देस-देसको कलेसु करै, दैहैं तौ प्रसंन ह्वै बड़ी बड़ाई बाँड़िए ।

  • सोनेको परखनेवाले ये सब क्रियाएँ करते हैं ।

कृपा-पाथनाथ लोकनाथ-नाथ सीतानाथ तजि रघुनाथ हाथ और काहि ओड़िये ॥२५॥ महाराजकी यह रीति है कि जिस याचकको अपनाते हैं उसके दोष, दुःख और दरिद्रताको दरिद्र ( क्षीण ) करके छोड़ते हैं । जिनका नामरूप कल्पवृक्ष चारों फलों ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) का देनेवाला है, गोसाईंजी कहते हैं, उन्हें त्याग कर बबूल और रेंड कौन रोपे ? राजाओंसे याचना कौन करे ? और देश- विदेश घूमनेका कष्ट कौन भोगे ? जो प्रसन्न होकर बहुत बढ़कर देंगे तो एक दमड़ीसे अधिक न देंगे, कृपाके समुद्र, लोकपालोंके स्वामी सीतानाथ श्रीरामचन्द्रजीको छोड़कर और किसके आगे हाथ फैलाया जाय ? जाकें बिलोकत लोकप होत, बिसोक लहैं सुरलोग सुठौरहि । सो कमला तजि चंचलता, करि कोटि कला रिझवै सुरमौरहि ॥ ताको कहाइ, कहै तुलसी, तूँ लजाहि न मागत कूकुर-कौरहि । जानकी जीवनको जनु है जरि जाउ सो जीह जो जाचत औरहि २६ जिसकी दृष्टिमात्रसे मनुष्य लोकपाल हो जाता है और देवतालोग सुन्दर शोकरहित स्थानको प्राप्त कर लेते हैं, वह लक्ष्मी ( अपनी स्वाभाविक ) चञ्चलता त्याग कर करोड़ों उपायों- से विष्णुरूप श्रीरामचन्द्रजीको रिझाती है; गोसाईंजी कहते हैं कि तू उनका कहलाकर कुत्तेको दिया जानेवाला टुकड़ा ( तुच्छ भोग ) माँगनेमें लज्जित नहीं होता । जानकीजीवन ( श्रीरामचन्द्र- जी ) का सेवक होकर भी जो दूसरेसे माँगता है, उसकी जीभ जल जाय ।

कवितावली १२२ जड पंच मिलै जेहि देह करी, करनी लखु धौं धरनीधरकी । जनकी, कहु, क्यों करिहै न सँभार, जो सार करै सचराचरकी ॥ तुलसी ! कहु राम समान को आन है, सेवकि जासु रमा घरकी । जगमें गति जाहि जगत्पतिकी, परवाह है ताहि कहा नरकी । २७। भला, उस धरणीधरकी लीला तो देखो, जिसने पाँच जड तत्त्वोंको मिलाकर यह देह बनायी है । इस प्रकार जो चराचरकी सँभाल करता है, कहो भला, अपने भक्तोंकी सँभाल वह क्यों न करेगा । गोसाईंजी अपनेसे ही कहते हैं—हे तुलसीदास ! बतलाओ तो, रामके समान दूसरा कौन है, जिसके घरकी किंकरी लक्ष्मी हैं; इस संसारमें जिसे उस जगत्पतिका ही भरोसा है, वह मनुष्यकी क्या परवा करेगा ? जग जाचिअ कोउ न, जाचिअ जौं, जियँ जाचिअ जानकीजानहि रे। जेहि जाचत जाचकता जरि जाइ, जो जारति जोर जहानहि रे ॥ गति देखु विचारि बिभीषनकी, अरु आनु हियँ हनुमानहि रे । तुलसी ! भजु दारिद-दोष-दवानल, संकट-कोटि-कृपानहि रे २८ संसारमें किसीसे (कुछ) माँगना नहीं चाहिये । यदि माँगना ही हो तो जानकीनाथ ( श्रीरामचन्द्रजी) से मनहीमें माँगो, जिनसे माँगते ही याचकता (दरिद्रता, कामना) जल जाती है जो बरबस जगत्‌को जला रही है। विभीषणकी दशाका विचार करके देखो और हनुमान्‌जीका भी स्मरण करो । गोसाईं- जी कहते हैं कि हे तुलसीदास ! दरिद्रतारूपी दोषको जलानेके लिये दावानलके समान और करोड़ों संकटोंको काटनेके लिये कृपाणरूप श्रीरामचन्द्रजीको भजो ।

१२३ उत्तरकाण्ड उद्बोधन सुनु कान दिएँ, नित नेमु लिएँ रघुनाथहिके गुनगाथहि रे । सुखमंदिर सुंदर रूपु सदा उर आनि धरें धनु-भाथहि रे ॥ रसना निसि-बासर सादर सों तुलसी ! जपु जानकीनाथहि रे । करु संग सुसील सुसंतन सों, तजि क्रूर, कुपंथ, कुसाथहि रे ।२९। हे तुलसीदास ! नित्य नियमपूर्वक कान ( ध्यान ) देकर श्रीरघुनाथजीकी गुणगाथा श्रवण करो । सुखके स्थान, धनुष और तरकस धारण किये हुए ( श्रीरामचन्द्रजीके ) सुन्दर स्वरूपका ही सदा स्मरण करो और जिह्वासे रात-दिन आदरपूर्वक श्रीजानकी- नाथका ही नाम जपो । सुशील और संत पुरुषोंका सङ्ग करो, एवं कपटी पुरुष, कुपंथ और कुसङ्गको त्याग दो । सुत, दार, अगारु, सखा, परिवारु विलोकु महा कुसमाजहि रे । सबकी ममता तजि कै, समता सजि, संतसभाँ न विराजहि रे ॥ नरदेह कहा, करि देखु विचारु, बिगारु गँवार न काजहि रे । जनि डोलहि लोलुप कूकुरु ज्यों, तुलसी भजु कोसलराजहि रे ३० पुत्र, कलत्र, घर, मित्र, परिवार—इन सबको महाकुसमाज समझो; सबकी ममता त्याग कर, समता धारणकर संतोंकी सभामें नहीं विराजता ? यह नरदेह क्या है, जरा विचारकर देखो । तुलसीदासजी ( अपने ही लिये ) कहते हैं—अरे गँवार ! कामको न बिगाड़ । लालची कुत्तेकी तरह ( इधर-उधर ) न भटक, कोसलराज ( श्रीरामचन्द्र ) का भजन कर । विषया परनारि निसा-तरुनाई सो पाइ परचो अनुरागहिं रे । जमके पहरू दुख, रोग, बियोग बिलोकत हू न बिरागहि रे ॥

कवितावली १२४ ममता बस तैं सब भूलि गयो भयो भोरु, महा भय, भागहि रे । जरठाइ-दिसाँ, रविकालु उग्यो, अजहूँ जड़ जीव ! न जागहि रे ३१ तरुणाईरूपी निशा पाकर तू विषयरूपी परस्त्रीकी प्रीतिमें फँस गया है । यमराजके पहरेदार दुःख, रोग और वियोगको देखकर भी तुझे वैराग्य नहीं होता । ममतावश तू सब भूल गया । अब भोर हो गया है, इस महान् भयसे भाग जा । बुढ़ापारूपी (पूर्व) दिशामें काल (मृत्यु) रूप सूर्यका उदय हो गया । अरे जड़ जीव ! तू अब भी नहीं जागता । जनम्यो जेहिं जोनि, अनेक क्रिया सुख लागि करीं, न परैं बरनी । जननी-जनकादि हितू भये भूरि, बहोरि भई उरकी जरनी ॥ तुलसी ! अब रामको दासु कहाइ, हिएँ धरु चातककी धरनी । करि हंसको बेषु बड़ो सबसों, तजि दे बक-बायसकी करनी । ३२। तूने जिस योनिमें जन्म लिया, उसीमें सुखके लिये अनेकों कर्म किये, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता । माता, पिता इत्यादि तेरे अनेकों हितैषी हुए और फिर उन्हींसे हृदयमें जलन होने लगी । गोसाईंजी (अपने लिये) कहते हैं कि अब रामका दास कहलाकर तो हृदयमें चातककी-सी टेक धारण कर [ अर्थात् जैसे चातक मेघके सिवा और किसीसे याचना नहीं करता उसी प्रकार तू भी रामको छोड़कर और किसीके आगे हाथ न पसार ] । अब सबसे बड़ा हंसका बेष धारण करके तो बगुला और कौओंकी- सी करनी छोड़ दे । भलि भारतभूमि, भलें कुल जन्मु, समाजु सरीरु भलो लहि कै । करषा तजि कै परुषा, बरषा, हिम, मारुत, घाम सदा सहि कै ॥

१२५ उत्तरकाण्ड जो भजै भगवानु सयान सोई, 'तुलसी' हठ चातकु ज्यों गहि कै। नतु और सबै बिषबीज बए, हर हाटक कामदुहा नहि कै ॥३३॥ भारतवर्षकी पवित्र भूमि है, उत्तम (आर्य) कुलमें जन्म हुआ है, समाज और शरीर भी उत्तम मिला है। गोसाईंजी कहते हैं—ऐसी अवस्थामें जो पुरुष क्रोध और कठोर वचन त्याग कर वर्षा, जाड़ा, वायु और घामको सहन करते हुए चातक- के समान हठपूर्वक सर्वदा भगवान्‌को भजता है, वही चतुर है; अन्यथा और सब तो सुवर्णके हलमें कामधेनुको जोतकर (केवल) विष-बीज बोते हैं। सो सुकृती सुचिमंत सुसंत, सुजान सुसीलसिरोमनि स्वै। सुर-तीरथ तासु मनावत आवत, पावन होत हैं तातनु छ्वै ॥ गुनगेहु सनेहको भाजनु सो, सब ही सों उठाइ कहौं भुज द्वै। सतिभायँ सदा छल छाडि सबै 'तुलसी' जो रहै रघुबीरको है ॥३४॥ तुलसीदासजी कहते हैं—मैं दोनों भुजाएँ उठाकर सभीसे कहता हूँ—जो (पुरुष) सब प्रकारके छल छोड़कर सच्चे भावसे श्रीरघुनाथजीका हो रहता है, वही पुण्यात्मा, पवित्र, साधु, सुजान और सुशीलशिरोमणि है; देवता और तीर्थ उसके मनाते ही आ जाते हैं और उसके शरीरका स्पर्श कर स्वयं भी पवित्र हो जाते हैं तथा वह सभी प्रकारके गुणोंका आकर और सबका स्नेहभाजन हो जाता है। विनय सो जननी, सो पिता, सोइ भाइ, सो भामिनि, सो सुतु, सो हितु मेरो सोइ सगो, सो सखा, सोइ सेवकु, सो गुरु, सो सुरु, साहेबु, चेरो ॥ सो 'तुलसी' प्रिय प्रानसमान, कहाँ लौं बनाइ कहौं बहुतेरो ।

कवितावली १२६ जो तजि देहको गेहको नेहु, सनेहसों रामको होइ सबेरो ॥३५॥ गोसाईंजी कहते हैं—जो पुरुष शरीर और घरकी ममता- को त्याग कर जल्दी-से-जल्दी स्नेहपूर्वक भगवान् रामका हो जाता है, वही मेरी माता है, वही पिता है, वही भाई है, वही स्त्री है, वही पुत्र है और वही हितैषी है तथा वही मेरा सम्बन्धी, वही मित्र, वही सेवक, वही गुरु, वही देवता, वही स्वामी और वही सेवक (अर्थात् वही सब कुछ) है। अधिक कहाँतक बनाकर कहूँ, वह मुझे प्राणोंके समान प्रिय है। रामु हैं मातु, पिता, गुरु, बंधु, औ संगी, सखा, सुतु, स्वामि, सनेही रामकी सौंह, भरोसो है रामको, राम रँग्यो, रुचि राच्यो न केही॥ जीअत रामु, मुएँ पुनि रामु, सदा रघुनाथहि की गति जेही। सोई जिए जगमें 'तुलसी' नतु डोलत और मुए धरि देही ॥३६॥ श्रीरामचन्द्र ही मेरी माता हैं, वे ही पिता हैं तथा वे ही गुरु, बन्धु, साथी, सखा, पुत्र, प्रभु और प्रेमी हैं। श्रीरामचन्द्र- की शपथ है, मुझे तो रामका ही भरोसा है, मैं रामहीके रंगमें रँगा हुआ हूँ, दूसरेमें रुचिपूर्वक मेरा मन ही नहीं लगता। गोसाईंजी कहते हैं—जिसे जीते हुए भी रामसे ही स्नेह है और जो मरनेपर भी रामहीमें मिल जाता है, इस प्रकार सदैव जिसे रामका ही भरोसा है, वही संसारमें जीता है, नहीं और सब तो मरे हुए ही देह धारण किये डोलते हैं। रामप्रेम ही सार है सियराम-सरूपु अगाध अनूप बिलोचन-मीननको जलु है। श्रुति रामकथा, मुख रामको नामु, हिएँ पुनि रामहिको थलु है॥