कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
८९ लंकाकाण्ड फिर (दोनों दल) क्रोधित हो तमककर तथा एक दूसरेकी ओर ताककर भारी युद्धमें भिड़ गये। सेनापतिलोग अपने-अपने दलके वीरोंकी सराहना करने लगे। झुंड-के-झुंड रुंड (बिना सिरके धड़) झूम-झूमकर झुकरे-से (परस्पर युद्ध हुए-से) नाचने लगे और श्रीरामचन्द्रके वीर युद्धमें सुमार (कठिन मार) मारने लगे।
तीखे तुरंग कुरंग सुरंगनि साजि चढ़े छाँटि छैल छबीले। भारी गुमान जिन्हें मनमें, कबहूँ न भए रनमें तन ढीले॥ तुलसी लखि कै गज केहरि ज्यों झपटे, पटके सब सूर सलीले। भूमि परे भट घूमि कराहत, हाँकि हने हनुमान हठीलें ॥३२॥
जिनके मनमें बड़ा गर्व था और रणमें जिनका शरीर कभी ढीला नहीं हुआ था, ऐसे चुने हुए छबीले छैल हरिणके समान तेज भागनेवाले एवं सुन्दर रंगवाले घोड़ोंको साजकर सवार हुए। गोसाईंजी कहते हैं कि जैसे हाथीको देखकर सिंह झपटता है उसी प्रकार हनुमान्जी लीलाहीसे सब वीरोंको झपटकर पटकने लगे और वे घूम-घूमकर पृथ्वीपर गिरने और कराहने लगे। इस प्रकार हठीले हनुमान्जी ललकार-ललकारकर राक्षसोंका वध करने लगे।
सूर सँजोइल साजि सुवाजि, सुसेल धरैं बगमेल चले हैं। भारी भुजा भरी, भारी सरीर, बली विजयी सब भाँति भले हैं॥ 'तुलसी' जिन्ह धाएँ धुकै धरनी, धरनीधर धौर धकान हले हैं। ते रन-तीखन लखन लाखन दानि ज्यों दारिद दाबि दले हैं ३३
बड़े-बड़े सजीले वीर सुन्दर घोड़ोंको सजाकर और तीखे भाले धारणकर घोड़ोंकी बागडोर छोड़कर (अथवा मिलाकर बराबर- बराबर) चले। उनकी बड़ी-बड़ी भरी हुई (मांसल) भुजाएँ और भारी शरीर हैं, वे सब प्रकार बली, विजयी और सुहावने मालूम होते हैं। गोसाईंजी कहते हैं—जिनके दौड़नेसे पृथ्वी काँपने लगती है और कठिन धक्कोंसे पर्वत डोलने लगते हैं, ऐसे रणमें तीक्ष्ण लाखों वीरोंको युद्धभूमिमें लक्ष्मणजीने इस प्रकार पलकके नष्ट कर दिया जैसे कोई दानी पुरुष [बहुत-सी सम्पत्ति दान-कर] दरिद्रताको नष्ट कर देता है।
गहि मंदर बंदर-भालु चले, सो मनो उनये घन सावनके। 'तुलसी' उत झुंड प्रचंड झुके, झपटैं भट जे सुरदावनके ॥ बिरुझे विरुदैत जे खेत अरे, न टरे हठि वैरु बढ़ावनके । रन मारि मची उपरी-उपरा भलें बीर रघुपति-रावनकें ॥३४॥
वानर और भालु पर्वतोंको लेकर इस प्रकार चले मानो सावनकी घटा घिर आयी हो। गोसाईंजी कहते हैं कि उधर देवताओंका नाश करनेवाले (रावण) के प्रचण्ड वीर भी झुंड-के-झुंड क्रुद्ध होकर झपटने लगे। हठपूर्वक वैर बढ़ानेवाले (रावण) के बहुत-से यशस्वी वीर जो मैदानमें अड़े थे वे एक दूसरेसे भिड़ गये और टालनेसे भी नहीं टलते थे। इस प्रकार श्रीरामचन्द्र और रावणके वीरोंमें ऊपरा-ऊपरी करके युद्धस्थलमें खूब लड़ाई छिड़ गयी।
सर-तोमर-सेलसमूह पँवारत, मारत बीर निसाचरके । इत तें तरु ताल-तमाल चले, खर खंड प्रचंड महीधरके ॥
८९. . लंकाकाण्ड 'तुलसी' करि केहरिनादु भिरे भट, खग्ग खगे, खपुआ खरके । नख-दंतन सों भुजदंड विहंडत, मुंडसों मुंड परे झरकैं ॥३५॥ राक्षस (रावण) के वीर तीर, बरछी और सेलोंके समूह फेंक-फेंककर मारते हैं और इधरसे ताड़ और तमालके वृक्ष तथा पर्वतोंके बड़े-बड़े पैने टुकड़े चलते हैं । गोसाईंजी कहते हैं कि सब वीर सिंहनाद करके भिड़ गये । उनमें जो शूर थे, वे तो तलवारोंके बीचमें धँस गये और कायर खिसक गये । (वानरगण) नख और दाँतोंसे भुजदण्डोंको विदीर्ण करते हैं और (भूमिपर) पड़े हुए मुंड एक-दूसरेका तिरस्कार करते हैं । रजनीचर-मत्तगयंद-घटा बिघटै मृगराजके साज लरै । झपटै भट कोटि महीं पटकै, गरजै, रघुबीरकी साँह करै ॥ तुलसी उत हाँक दसाननु देत, अचेत भे बीर, को धीर धरै । बिरुझो रन मारुतको बिरुदैत, जो कालहु कालु सो बूझि परै।३६। (हनुमान्जी) राक्षसरूपी मतवाले हाथियोंके समूहका नाश करते हुए सिंहके समान युद्ध करते हैं । (वे) झपटकर करोड़ों वीरोंको पृथ्वीपर पटककर गरजते हैं और श्रीरामचन्द्रकी दुहाई देते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि उधरसे रावण हाँक देता है, (जिसे सुनकर, रामचन्द्रजीके पक्षके) वीर अचेत हो जाते हैं—(उस हाँकको सुनकर) कौन ऐसा है जो धैर्य धारण कर सके । यशस्वी वीर वायुनन्दन युद्धभूमिमें भिड़ गये, जो इस समय कालको भी काल-से दीख पड़ते हैं । जे रजनीचर बीर बिसाल, कराल बिलोकत काल न खाए । ते रन-रोर कपीसकिसोर बड़े बरजोर परे पग पाए ॥
कवितावली ९० लूम लपेटि, अकास निहारि कै, हाँकि हठी हनुमान चलाए । सूखि गे गात, चले नभ जात, परे भ्रमवात, न भूतल आए ॥३७॥ जिन विशाल वीर निशाचरोंको विकराल समझकर कालने भी नहीं खाया उन रणकर्कश बलवानोंको केसरीकिशोरने अपने दावमें पड़े पाया और उन्हें ललकारकर हठी हनुमान्जीने आकाश- की ओर देखते हुए पूँछमें लपेटकर फेंक दिया । उनके शरीर सूख गये और बवंडरमें पड़नेसे आकाशमें चले जा रहे हैं, लौटकर पृथ्वीपर नहीं आते । जो दससीसु महीधर ईसको बीस भुजा खुलि खेलनिहारो । लोकप, दिग्गज, दानव, देव, सबै सहमे सुनि साहसु भारो ॥ बीर बड़ो बिरुदैत बली, अजहूँ जग जागत जासु पँवारो । सो हनुमान हन्यो मुठिकाँ गिरि गो गिरिराजु ज्यों गाजको मारो॥ जो रावण, शिवजीके पर्वत (कैलास) को बीसों भुजाओंसे उठाकर स्वच्छन्दतापूर्वक खेलनेवाला था, जिसके भारी साहसको सुनकर लोकपाल, दिक्पाल, दैत्य और देवगण सभी डर गये थे; जो बड़ा यशस्वी और बलशाली वीर था तथा जिसकी कीर्तिकथा आज भी जगत्में गायी जाती है उसी रावणको हनुमान्जीने मुक्केसे मारा तो जैसे वज्रके प्रहारसे पर्वत गिर जाता है, उसी प्रकार गिर गया । दुर्गम दुर्ग, पहारतें भारे, प्रचंड महा भुजदंड बने हैं। लक्खमें पक्खर, तिक्खन तेज, जे सूरसमाजमें गाज गने हैं ॥ ते बिरुदैत बली रनबाँकुरे हाँकि हठी हनुमान हने हैं। नामु लै रामु देखावत बंधुको, घूमत घायल घायँ घने हैं ॥३९॥
९१ लंकाकाण्ड जिनके महाप्रचण्ड भुजदण्ड दुर्ग (किले) से भी दुर्गम और पहाड़से भी विशाल हैं, जो लाखोंमें प्रबल हैं और जिनका तेज बड़ा तीक्ष्ण है तथा जो शूर-समाजमें बिजलीके समान गिने जाते हैं, उन रणबाँकुरे प्रसिद्ध पराक्रमी निशाचरोंको हठी हनुमान्जीने प्रचारकर मारा है और जो वीर बहुत चोट खाये हुए घूम रहे हैं, उनको श्रीरामचन्द्रजी नाम ले-लेकर अपने भाई लक्ष्मणजीको दिखला रहे हैं। हाथिन सों हाथी मारे, घोरेसौं सँघारे घोरे, रथनि सों रथ बिदरनि बलवानकी। चंचल चपेट, चोट चरन, चकोट चाहें, डहरानीं फौजें भहरानीं जातुधानकी ॥ बार-बार सेवक-सराहना करत रामु, 'तुलसी' सराह रीति साहेब सुजानकी। लाँबी लूम लसत, लपेटि पटकत भट, देखौ देखौ, लखन ! लरनि हनुमानकी ॥४०॥ हाथियोंसे हाथियोंको मार डाला है, घोड़ोंसे घोड़ोंका संहार कर दिया और रथोंसे मजबूत रथोंको (टकराकर) तोड़ डाला। हनुमान्जीकी चञ्चल चपेट, लातोंकी चोट और चुटकी काटना देखकर निशाचरोंकी सेनाएँ घबड़ा गयीं और चक्कर खाकर गिरने लगीं। श्रीराम बार-बार अपने सेवककी सराहना करते हुए कहते हैं—लक्ष्मण! तनिक हनुमान्जीका युद्धकौशल तो देखो, उनकी लंबी पूँछ कैसी शोभायमान है जिसमें लपेट-लपेटकर वे राक्षस वीरोंको पटक रहे हैं। गोसाईं जी भी अपने सुजान स्वामीकी (सेवकवत्सलताकी) रीतिकी सराहना करते हैं।
कवितावली ९२ दबकि दबोरे एक, वारिधिमें बोरे एक, मगन महीमें, एक गगन उड़ात हैं। पकरि पछारे कर, चरन उखारे एक, चीरि-फारि डारे, एक मीजि मारे लात हैं ॥ ‘तुलसी’ लखत, रामु, रावन, विबुध, बिधि, चक्रपानि, चंडीपति, चंडिका सिहात हैं। बड़े-बड़े बानइत बीर बलवान बड़े, जातुधान-जूथप निपाते बातजात हैं ॥४१॥ उन्होंने किसीको चुपकेसे दबोच डाला, किसीको समुद्रमें डुबा दिया, किसीको पृथ्वीमें गाड़ दिया, किसीको आकाशमें उड़ा दिया, किसीको हाथ पकड़कर पछाड़ दिया, किसीके पैर उखाड़ लिये, किसीको चीर-फाड़ डाला और किसीको लातसे मसलकर मार दिया। गोसाईंजी कहते हैं कि उन्हें देखकर श्रीराम और रावण, देवगण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव और चण्डी मन-ही-मन प्रशंसा कर रहे हैं। हनुमान्जीने बड़े-बड़े यशस्वी वीर और बलवान् निशाचर- सेनापतियोंको मार डाला। प्रबल प्रचंड बरिबंड बाहुदंड बीर धाए जातुधान, हनुमानु लियो घेरि कै। महाबलपुंज कुंजरारि ज्यों गरजि, भट जहाँ-तहाँ पटके लँगूर फेरि-फेरि कै ॥ मारे लात, तोरे गात, भागे जात हाहा खात, कहैं ‘तुलसीस ! राखि’ रामकी सौं टेरि कै।
९३ लंकाकांड ठहर-ठहर परे, कहारि-कहरि उठैं, हहरि-हहरि हरु सिद्ध हँसे हेरि कै ॥४२॥ तब जिनके भुजदण्ड बड़े उद्दण्ड हैं ऐसे बहुत-से प्रबल और प्रचण्ड राक्षसवीर दौड़े और उन्होंने हनुमान्जीको घेर लिया। किन्तु महाबलराशि वीर हनुमान्जी सिंहके समान गरजकर उन वीरोंको लाङ्गूल घुमा-घुमाकर जहाँ-तहाँ पटकने लगे। उन्होंने मारे लातोंके राक्षसोंके अङ्ग-प्रत्यङ्ग तोड़ डाले। वे गिड़गिड़ाते हुए भागे जाते हैं और श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई देकर कहते हैं कि हे तुलसीदासके स्वामी हनुमान् ! हमारी रक्षा करो। वे ठौर-ठौर पड़े कराह-कराह- कर उठते हैं; उन्हें देख-देखकर शिवजी और सिद्धगण ठहाका मारकर हँसने लगे। जाकी बाँकी बीरता सुनत सहमत सूर, जाकी आँच अबहूँ लसत लंक लाह-सी। सोई हनुमानु बलवान बाँको बानइत, जोहि जातुधान-सेना चल्यो लेत थाह-सी ॥ कंपत अकंपन, सुखाय अतिकायकाय, कुंभऊकरन आइ रह्यो पाइ आह-सी। देखें गजराज मृगराजु ज्यों गरजि धायो, बीर रघुबीरको समीरस्नू साहसी ॥४३॥ जिसकी बाँकी वीरताको सुनकर वीरलोग भय खाते हैं, जिसकी लगायी हुई आँचसे आज भी लंका लाह-सी मालूम होती है, वही बाँके बानेवाले बलवान् हनुमान्जी निशाचरोंकी सेनाको देखकर उसकी थाह-सी लेते चले। उस समय अकम्पन (रावणका पुत्र)
कवितावली ९४ काँपने लगा, अतिकाय ( रावणके पुत्र ) का शरीर सूख गया और कुम्भकर्ण भी आकर आह-सी लेकर पड़ रहा । जैसे गजराजोंको देखकर सिंह दौड़ता है, वैसे ही श्रीरामचन्द्रजीके धीर साहसी पवनपुत्र ( हनुमान्जी ) उन्हें देखते ही गरजकर दौड़े । झूलना मत्त-भट-मुकुट-दसकंठ-साहस-सेल- सृंग-बिदरनि जनु बज्र-टाँकी । दसन धरि धरनि चिक्करत दिग्गज, कमठु, सेषु संकुचित, संकित पिनाकी ॥ चलत महि-मेरु, उच्छलत सायर सकल, बिकल बिधि बधिर दिसि-बिदिसि झाँकी । रजनिचर-घरनि घर गर्भ-अर्भक स्रवत, सुनत हनुमानकी हाँक बाँकी ॥४४॥ जो उन्मत्त वीरोंमें शिरोमणि रावणके साहसरूपी शैल- शिखरको विदारण करनेके लिये मानो वज्रकी टाँकी हैं, उन हनुमान्जीकी भयंकर ललकारको सुनकर दिक्पाल दाँतोंसे पृथ्वीको दबाकर चिक्कारने लगते हैं, कच्छप और शेषजी ( भयके मारे ) सिकुड़ जाते हैं और शिवजी भी सन्देहमें पड़ जाते हैं, पृथ्वी तथा सुमेरु विचलित हो जाते हैं, सातों समुद्र उछलने लगते हैं, ब्रह्माजी व्याकुल तथा बधिर होकर दिशा-विदिशाओंको झाँकने लगते हैं और घर-घरमें निशाचरोंकी स्त्रियोंके गर्भपात होने लगते हैं ।
२५ लंकाकाण्ड कौनकी हाँकपर चौंक चंडीसु, विधि, चंडकर थकित फिरि तुरग हाँके। कौनके तेज बलसीम भट भीम-से भीमता निरखि कर नयन ढाँके॥ दास-तुलसीसके विरुद बरनत विबुध, बीर विरुदैत बर बैरि धाँके। नाक नरलोक पाताल कोउ कहत किन, कहाँ हनुमानु-से बीर बाँके॥४५॥ किसकी हाँकपर ब्रह्मा और शिवजी चौंक उठते हैं और सूर्य थकित होकर फिर (अपने रथके) घोड़ोंको हाँकते हैं? किसके तेजकी भयङ्करताको देखकर भीमसेन-जैसे बलसीम वीर भी हाथोंसे नेत्र मूँद लेते हैं? बुद्धिमान् लोग तुलसीदासके स्वामी (हनुमान् जी) के यशका गान करते हुए कहते हैं कि उन्होंने अच्छे-अच्छे कीर्तिशाली वीर शत्रुओंपर धाक जमा ली। कोई बतलावे तो सही कि हनुमान् जी के समान बाँका वीर आकाश, मनुष्यलोक और पातालमें कहाँ है? जातुधानावली-मत्तकुंजरघटा निरखि मृगराजु ज्यों गिरितें टूट्यो। बिकट चटकन चोट, चरन गहि, पटकि महि, निघटि गए सुभट, सतु सबको छूट्यो॥ 'दासु तुलसी' परत धरनि धरकत, झुकत हाट-सी उठति जंबुकनि लूट्यो।
कवितावली ९६ धीरु रघुबीरको बीरु रनबाँकुरो · हाँकि हनुमान कुलि कटकु कूट्यो ॥४६॥ जैसे मतवाले हाथियोंके झुंडको देखकर सिंह पर्वतपरसे उनपर टूट पड़ता है, वैसे ही राक्षसोंके समूहको देखकर हनुमान्जी उनपर झपट पड़े । चपतोंकी विकट चोटसे और पाँव पकड़कर पृथ्वीपर पछाड़नेसे सब वीर निःशेष हो गये और सबका बल जाता रहा । गोसाईंजी कहते हैं कि वीरोंके पृथ्वीपर गिरनेसे पृथ्वी धड़कने लगी और वीरोंको गिरते-गिरते स्यारोंने इस प्रकार लूट लिया जैसे उठती हुई पैठको लुटेरे लूट लेते हैं । श्रीरामचन्द्रके धीर-वीर रणबाँकुरे हनुमान्जीने ललकार-ललकारकर सारी सेनाकी कुन्दी कर दी । छप्पै कतहुँ बिटप-भूधर उपारि परसेन बरषत । कतहुँ बाजिसों बाजि मर्दि, गजराज करषत ॥ चरनचोट चटकन चकोट अरि-उर-सिर बज्रत । बिकट कटकु बिदरत बीरु बारिदु जिमि गज्जत ॥ लंगूर लपेटत पटकि भट, 'जयति राम, जय !' उच्चरत । तुलसीस पवननंदनु अटल जुद्ध क्रुद्ध कौतुक करत ॥४७॥ वे कहीं तो वृक्ष और पर्वत उखाड़कर शत्रुसेनापर बरसाते हैं, कहीं घोड़ेसे घोड़ेको मसल डालते हैं और कहीं हाथियोंको घसीट-घसीटकर मारते हैं । उनके लात और थप्पड़की चोट शत्रुओंकी छाती और सिरपर बजती है । वे वीरवर उस कठिन सेनाका संहार करते हुए मेघके समान गरजते हैं । योद्धाओंको पूँछमें लपेटकर (पृथ्वीपर) पटकते हुए वे 'जय राम', 'जय राम'
९७ लंकाकाण्ड उच्चारण करते हैं । इस प्रकार तुलसीदासके प्रभु पवनकुमार (हनुमान्जी) क्रोधित होकर अविचल युद्धलीला करते हैं। अंग-अंग दलित ललित फूले किंसुक-से, हने भट लाखन लखन जातुधानके। मारि कै, पछारि कै, उपारि भुजदंड चंड, खंडि-खंडि डारे ते बिदारे हनुमानके ॥ कूदत कबंधके कदंब बंब-सी करत, धावत दिखावत हैं लाघौ राघौबानके। तुलसी महेसु, विधि, लोकपाल, देवगन, देखत बेवान चढ़े कौतुक मसानके ॥४८॥ लक्ष्मणजीके द्वारा मारे हुए रावणके लाखों वीरोंका अङ्ग-अङ्ग घायल हो गया, जिससे वे फूले हुए सुन्दर पलाशके समान मालूम होते हैं। (और कुछ वीरोंको) हनुमान्जीने मारकर, पछाड़कर, उनके प्रबल भुजदण्डोंको उखाड़कर, विशीर्णकर तथा खण्ड-खण्ड करके डाल दिया। कबन्धोंके झुंड बंबं शब्द करते कूदते फिरते हैं और दौड़-दौड़कर मानो श्रीरामचन्द्रके बाणोंकी शीघ्रता दिखाते हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि उस समय शिव, ब्रह्मा (आठों) लोकपाल और (अन्य) देवगण भी विमानोंपर चढ़े रणभूमिका तमाशा देखते हैं। लोथिन सों लोहूके प्रबाह चले जहाँ-तहाँ, मानहुँ गिरिन्ह गेरु-झरना झरत हैं। श्रोनितसरित घोर, कुंजर-करारे भारे, कूलतें समूल बाजि-बिटप परत हैं॥ क० ७—
कवितावली ९८ सुभट-सरीर नीरचारी भारी-भारी तहाँ, सूरनि उछाहू, कूर-कादर डरत हैं। फेकारि-फेकारि फेरु फारि-फारि पेट खात, काक-कंक बालक कोलाहलु करत हैं ॥४९॥ जहाँ-तहाँ लोथोंसे लोहूकी धाराएँ बह चलीं, मानो पर्वतोंसे गेरूके झरने झर रहे हैं। लोहूकी भयंकर नदी बहने लगी; हाथी उस नदीके भारी करारे हैं और घोड़े गिरते हुए ऐसे मालूम होते हैं मानो किनारेके वृक्ष जड़सहित उखड़कर पड़ रहे हैं। वीरोंके शरीर उस नदीके बड़े-बड़े जलजन्तु हैं। उस दृश्यको देखकर शूरवीरोंको तो बड़ा उत्साह होता है। किन्तु निकम्मे और कायर लोग डरते हैं। सियार चिल्ला-चिल्लाकर पेट फाड़-फाड़कर खाते हैं और कौए, गृध्र आदि बालकोंके समान कोलाहल कर रहे हैं। ओझरीकी झोरी काँधें, आँतनि की सेल्ही बाँधें, मूँड़के कमंडल खपर किएँ कोरि कै। जोगिनीं झुंटुंग झुंड-झुंड बनीं तापसीं-सी तीर-तीर बैठीं सो समर-सरि खोरि कै॥ श्रोनितसों सानि-सानि गूदा खात सतुआ-से, प्रेत एक पिअत बहोरि घोरि-घोरि कै। 'तुलसी' बैताल-भूत साथ लिएँ भूतनाथु, हेरि-हेरि हँसत हैं हाथ-हाथ जोरि कै ॥५०॥ कंधेपर पेटकी पचौनी*की झोली लिये, अँतड़ियोंकी सेल्ही (गंडा) बाँधे और खोपड़ीके कमण्डलुको खुरचकर खप्पर बनाये
- पेटके भीतरकी वह थैली जिसमें भोजन रहता है।
९९ लंकाकाण्ड जटाधारी जोगिनियोंके झुंड-के-झुंड तपस्विनियोंकी भाँति समररूपी नदीमें स्नानकर किनारे-किनारे बैठी हैं। वे गूदे (मांस) को रुधिरसे सान-सानकर सत्तूके समान खा रही हैं और कोई-कोई प्रेत उसे घोल-घोलकर पी जाते हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि भूतनाथ भैरव भूत और बेतालोंको साथ लिये उनकी ओर देख-देखकर हाथ-से- हाथ मिला हँस रहे हैं। राम-सरासन तें चले तीर रहे न सरीर, हड़ावरि फूटीं। रावन धीर न पीर गनी, लखि लै कर खप्पर जोगिनि जूटीं।। श्रोनित-छीट-छटानि जटे तुलसी प्रभु सोहैं, महाछवि छूटी। मानो मरकत-सैल बिसाल में फैलि चलीं बर बीरबहूटीं ॥५१॥ श्रीरामचन्द्रके धनुषसे छूटकर बाण रावणके शरीरमें अटकते नहीं, अस्थिपञ्जरको फोड़कर निकल जाते हैं। तो भी धीर रावण इस पीड़ाको कुछ भी नहीं गिनता। यह देखकर जोगिनियाँ हाथमें खप्पर लेकर (रक्तपानार्थ) जुट गयीं। रुधिरके छींटोंकी छटासे युक्त होकर तुलसीदासके प्रभु (भगवान् श्रीरामचन्द्र) बड़े सुहावने मालूम होते हैं। उनकी सुन्दर छवि ऐसी मालूम होती है, मानो मरकतके विशाल पर्वतपर सुन्दर वीरबहूटियाँ फैल गयी हों। लक्ष्मणमूर्च्छा मानी मेघनादसों प्रचारि भिरे भारी भट, आपने-अपन पुरुषारथ न ढील की। घायल लखनलालु लखि बिलखाने रामु, भई आस सिथिल जगन्निवास-दीलकी ॥ भाईको न मोहु, छोहु सीयको न तुलसीस,
कवितावली १०० कहैं 'मैं विभीषनकी कछु न सबील की' । लाज बाँह बोलेकी, नेवाजेकी सँभार-सार, साहेबु न रामु से बलाइ लेउँ सीलकी ॥५२॥ बड़े-बड़े वीर अभिमानी मेघनादसे ललकारकर भिड़ गये और उन्होंने अपने-अपने पुरुषार्थमें कमी नहीं की । लक्ष्मणजीको घायल देखकर श्रीरामचन्द्रजी बिलखने लगे और जगत्के निवासस्थान ( भगवान् ) के दिलकी आशाएँ शिथिल हो गयीं । तुलसीदासके स्वामीको न तो भाईका मोह है और न जानकीजीकी ममता है, वे यही कह रहे हैं कि मैंने विभीषणके लिये कुछ भी प्रबन्ध नहीं किया । उन्हें तो अपनी शरणमें लियेकी लाज है और अपने अनुगृहीत दासकी सार-सँभालका ख्याल है । श्रीरामचन्द्रजीके समान कोई स्वामी नहीं है, मैं उनके शीलकी बलिहारी जाता हूँ । कानन बासु, दसाननु सो रिपु, आननश्री ससि जीति लियो है । बालि महा बलसालि दल्यो, कपि पालि बिभीषनु भूपु कियो है ॥ तीय हरी, रन बंधु पर्यो, पै भरयो सरनागत-सोच हियो है । बाँह-पगार उदार कृपाल कहाँ रघुबीरू सो बीरु बियो है ॥५३॥ वनमें निवास है और दसमुख रावणके समान प्रबल शत्रु है, तो भी प्रभुके मुखकी शोभाने चन्द्रमाकी शोभाको जीत लिया
१०१ लंकाकाण्ड है । महाबलशाली बालिको मारकर सुग्रीवकी रक्षा की और विभीषणको राजा बनाया । इधर स्त्री हरी गयी और भाई भी समरमें गिर गये; तो भी हृदयमें शरणागतकी ही चिन्ता है । भला, श्रीराम- चन्द्रजीके समान अपनी भुजाका आश्रय देनेवाला उदार और दयालु वीर दूसरा कहाँ मिलेगा ? लीन्हो उखारि पहारु बिसाल, चल्यो तेहि काल, बिलंबु न लायो । मारुतनंदन मारुतको, मनको, खगराजको वेगु लजायो ॥ तीखी तुरा 'तुलसी' कहतो, पै हिएँ उपमाको समाउ न आयो । मानो प्रतच्छ परब्बतकी नभ लीक लसी, कपि यों धुकि धायो ॥५४॥ [ लक्ष्मणजीकी मूर्च्छानिवृत्तिके लिये जब सुषेणने सञ्जीवनी बूटी निश्चित की तो उसे लानेके लिये श्रीहनुमान् जी द्रोणाचल पर्वतपर गये । तब उसे पहचान न सकनेके कारण ] उन्होंने उस विशाल पर्वतको उखाड़ लिया और तनिक भी विलम्ब न कर तत्काल चल दिये । उस समय मारुतनन्दन ( हनुमान्जी ) ने वायु, गरुड़ और मनकी गतिको भी लज्जित कर दिया । गोसाईंजी कहते हैं कि मैं उनके प्रचण्ड वेगका वर्णन करता; परन्तु हृदयमें उसकी उपमाकी सामग्री कहीं नहीं मिली । हनुमान्जी झपटकर ऐसे दौड़े कि आकाशमें पर्वतकी प्रत्यक्ष लकीर-सी शोभित होने लगी । [ तात्पर्य यह कि ऐसी शीघ्रतासे हनुमान्जी पर्वत लेकर चले कि चलने और
कवितावली १०२ पहुँचनेके स्थानतक एक ही पर्वत मालूम होता था । ] चल्यो हनुमानु, सुनि जातुधानु कालनेमि पठयो, सो मुनि भयो, पायो फलु छलि कै । सहसा उखारो है पहारु बहु जोजनको, रखवारे मारे भारे भूरि भट दलि कै ॥ बेगु, बलु, साहसु, सराहत कृपाल रामु, भरतकी कुसल, अचलू ल्यायो चलि कै । हाथ हरिनाथके बिकाने रघुनाथु जनु, सीलसिंधु तुलसीस भलो मान्यो भलि कै ॥५५॥ हनुमान्जीका जाना सुन रावणने राक्षस कालनेमिको भेजा । उसने मुनिका वेष बनाया और इस प्रकार छल करनेका फल पाया, अर्थात् मारा गया । हनुमान्जीने अनेकों योजनके पर्वतको सहसा उखाड़ लिया और रक्षकोंको मारकर बड़े-बड़े अनेक वीरोंका नाश कर दिया । 'देखो, हनुमान्जी चलकर पर्वत और भरतजीका कुशल-समाचार लाये हैं'—ऐसा कहकर कृपालु रघुनाथजी उनके बल, साहस और वेगकी सराहना करने लगे । मानो श्रीरामचन्द्रजी कपिनाथ (हनुमान्जी) के हाथ बिक गये । तुलसीदासके स्वामी शीलसिन्धु श्रीरामचन्द्रने सम्यक् प्रकारसे उनका उपकार माना । युद्धका अन्त बाप दियो काननु भो आननु सुभाननु सो, बैरी भो दसाननु सो, तीयको हरनु भो । बालि बलसालि दलि, पालि कपिराजको,
६. लंकाकाण्ड (रावण युद्ध व विजय)
१०३ लंकाकाण्ड विभीषनु नेवाजि, सेत सागर-तरनु भो ॥ घोर रारि हेरि त्रिपुरारि-बिधि हारे हिएँ, घायल लखन बीर बानर बरनु भो । ऐसे सोकमें तिलोकु कै बिसोक पलही में, सबही को तुलसीको साहेबु सरनु भो ॥५६॥ पिताने वनवास दिया, रावण-जैसा वीर शत्रु हो गया, जिसके द्वारा सीताजी हरी गयीं, तो भी जिनका मुख बड़ा प्रसन्न रहा- मलिन नहीं हुआ। बलशाली बालिको मारकर सुग्रीवकी रक्षा की, विभीषणपर कृपा की और पुल बाँधकर समुद्रको लाँघा; फिर जिनके घोर युद्धको देखकर शिव और ब्रह्मा भी हृदयमें हार गये और वीर लक्ष्मणजी घायल होकर (खून और मिट्टीसे ऐसे लथपथ हो गये कि) उनका रंग वानरोंका-सा (भूरा) हो गया। ऐसे शोकमें भी जिन्होंने तीनों लोकोंको पलमात्रमें विशोक कर दिया अर्थात् लक्ष्मणजीको सचेत और रावणको मारकर सबकी रक्षा की, वे तुलसीदासके प्रभु सभीको शरण देनेवाले हुए । कुंभकरन्नु हन्यो रन राम, दल्यो दसकंधरु, कंधर तोरे । पूषनबंसविभूषन-पूषन-तेज-प्रताप गरे अरि-ओरे ॥ देव निसान बजावत, गावत, सावँतु गो, मनभावत भो रे । नाचत बानर-भालु सबै 'तुलसी' कहि 'हा रे! हहा भै अहो रे!'।५७। भगवान् रामने युद्धमें कुम्भकर्णको मारा और रावणकी गर्दनें तोड़कर उसका भी वध किया। इस प्रकार सूर्यवंशविभूषण श्रीराम- रूप सूर्यके प्रतापरूप तेजसे शत्रुरूपी ओले गल गये । देवतालोग नगाड़े बजाकर गाते हैं, क्योंकि उनका सामन्तपना
कवितावली १०४ (अधीनता) चला गया और उनकी मनभायी बात हुई है। तथा वानर-भालु भी सब-के-सब 'ओहो रे ! खूब हुई, ओहो रे ! खूब हुई' ऐसा कहकर नाचते हैं। मारे रन रातिचर रावनु सकुल दलि, अनुकूल देव-मुनि फूल बरषतु हैं। नाग, नर, किंनर, बिरंचि, हरि, हरु हेरि पुलक सरीर, हिएँ हेतु हरषतु हैं॥ बाम ओर जानकी कृपानिधानके बिराजैं, देखत बिषादु मिटै, मोदु करषतु हैं। आयसु भो, लोकनि सिधारे लोकपाल सबै, 'तुलसी' निहाल कै कै दिये सरखतु हैं॥५८॥ श्रीरामचन्द्रजीने रावणका उसके कुलसहित दलन कर युद्धमें राक्षसोंका संहार किया। इससे देवता और मुनिगण प्रसन्न होकर फूलोंकी वर्षा करने लगे। यह देखकर नाग, नर, किन्नर तथा ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीके शरीर पुलकित हो जाते हैं और हृदयमें प्रेम और आनन्द भर जाता है। कृपानिधान (श्रीरामचन्द्रजी) की बायीं ओर जानकीजी विराजमान हैं, जिनके दर्शनसे विषाद मिट जाता है और आनन्द वृद्धिको प्राप्त होता है। लोकपाल सब आज्ञा पाकर अपने-अपने लोकोंको चले गये। गोसाईंजी कहते हैं कि भगवान्ने सबको निहाल कर-करके मानो परवाना दे दिया (कि अब तुमलोग निर्भय रहो)। इति लंकाकाण्ड
उत्तरकाण्ड रामकी कृपालुता बालि-सो बीरु बिदारि सुकंठु थप्यो, हरषे सुर, बाजने बाजे । पलमें दल्यो दासरथीं दसकंधरु, लंक विभीषनु राज बिराजे ॥ राम-सुभाउ सुनैं 'तुलसी' हुलसै अलसी हम-से गलगाजे । कायर क्रूर कपूतनकी हद, तेउ गरीबनेवाज नेवाजे ॥१॥ बालि-से वीरको मारकर ( श्रीरामचन्द्रजीने ) सुग्रीवको राज्य दिया । इससे देवता लोग हर्षित होकर बाजे बजाने लगे । दशरथनन्दन ( श्रीरामचन्द्र ) ने पलभरमें रावणको मार डाला और लंकामें विभीषण राज्यपर सुशोभित हुए । तुलसीदासजी कहते हैं—श्रीरामचन्द्रजीका खभाव सुनकर मेरे-जैसे और आलसी भी आनन्दित होकर गाल बजाते हैं । जो लोग कायर, क्रूर और कपूतोंकी हद थे, उनपर भी गरीबनिवाज भगवान् रामने कृपा की । बेद पढ़ैं विधि, संभु सभीत पुजावन रावनसों नितु आवैं । दानव-देव दयावने दीन दुखी दिन दूरिहि तें सिरु नावैं ॥ ऐसेउ भाग भगे दसभाल तें, जो प्रभुता कबि-कोबिद गावैं । रामसे बाम भएॅं तेहि बामहि बाम सबै सुख-संपति लावैं ॥२॥
कवितावली १०६ रावणके यहाँ ब्रह्माजी ( स्वयं ) वेदपाठ करते थे और शिवजी भयवश नित्यपूजन करानेके लिये आते थे तथा दैत्य और देवगण दुखी, दीन एवं दयापात्र होकर उसे प्रतिदिन दूरहीसे सिर नवाते थे । ऐसा भाग्य भी, जिसकी प्रभुता कवि-कोविद गाते हैं, उस रावणको छोड़कर भाग गया । श्रीरामचन्द्रसे विमुख होनेपर सारी सुख-सम्पदाएँ उस वामसे विमुख हो जाती हैं । बेदबिरुद्ध मही, मुनि, साधु ससोक किए, सुरलोकु उजारो । और कहा कहाँ, तीय हरी, तबहूँ करुनाकर कोपु न धारो ॥ सेवक-छोह तें छाड़ी छमा, तुलसीं लख्यो राम ! सुभाउ तिहारो। तौलौं न दापु दल्यो दसकंधर, जौलौं बिभीषन लातु न मारो ॥३॥ वेदविरुद्ध आचरण करनेवाले रावणने पृथ्वी, मुनिगण और साधुओंको शोकयुक्त कर दिया तथा देवलोकको उजाड़ डाला और कहाँतक कहें, उसने ( उनकी ) स्त्रीतकको चुरा लिया, तब भी करुणाकर ( प्रभु ) ने उसपर क्रोध नहीं किया । गोसाईंजी कहते हैं कि हे श्रीरामचन्द्रजी ! मैंने आपका स्वभाव जान लिया; आपने सेवक ( विभीषण ) के स्नेहवश ही ( अपनी स्वाभाविक ) क्षमाको छोड़ा; क्योंकि जबतक रावणने विभीषणको लात नहीं मारी तबतक आपने उसके दर्पको चूर्ण नहीं किया । सोकसमुद्र निमज्जत काढ़ि कपीसु कियो, जगु जानत जैसो । नीच निसाचर बैरिको बंधु बिभीषनु कीन्ह पुरंदर-कैसो ॥ नाम लिएँ अपनाइ लियो तुलसी-सो, कहौ, जग कौन अनैसो । आरत-आरति-भंजन रामु, गरीबनेवाज न दूसरो ऐसो ॥४॥