कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ९८ सुभट-सरीर नीरचारी भारी-भारी तहाँ, सूरनि उछाहू, कूर-कादर डरत हैं। फेकारि-फेकारि फेरु फारि-फारि पेट खात, काक-कंक बालक कोलाहलु करत हैं ॥४९॥ जहाँ-तहाँ लोथोंसे लोहूकी धाराएँ बह चलीं, मानो पर्वतोंसे गेरूके झरने झर रहे हैं। लोहूकी भयंकर नदी बहने लगी; हाथी उस नदीके भारी करारे हैं और घोड़े गिरते हुए ऐसे मालूम होते हैं मानो किनारेके वृक्ष जड़सहित उखड़कर पड़ रहे हैं। वीरोंके शरीर उस नदीके बड़े-बड़े जलजन्तु हैं। उस दृश्यको देखकर शूरवीरोंको तो बड़ा उत्साह होता है। किन्तु निकम्मे और कायर लोग डरते हैं। सियार चिल्ला-चिल्लाकर पेट फाड़-फाड़कर खाते हैं और कौए, गृध्र आदि बालकोंके समान कोलाहल कर रहे हैं। ओझरीकी झोरी काँधें, आँतनि की सेल्ही बाँधें, मूँड़के कमंडल खपर किएँ कोरि कै। जोगिनीं झुंटुंग झुंड-झुंड बनीं तापसीं-सी तीर-तीर बैठीं सो समर-सरि खोरि कै॥ श्रोनितसों सानि-सानि गूदा खात सतुआ-से, प्रेत एक पिअत बहोरि घोरि-घोरि कै। 'तुलसी' बैताल-भूत साथ लिएँ भूतनाथु, हेरि-हेरि हँसत हैं हाथ-हाथ जोरि कै ॥५०॥ कंधेपर पेटकी पचौनी*की झोली लिये, अँतड़ियोंकी सेल्ही (गंडा) बाँधे और खोपड़ीके कमण्डलुको खुरचकर खप्पर बनाये
- पेटके भीतरकी वह थैली जिसमें भोजन रहता है।