भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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९७ लंकाकाण्ड उच्चारण करते हैं । इस प्रकार तुलसीदासके प्रभु पवनकुमार (हनुमान्‌जी) क्रोधित होकर अविचल युद्धलीला करते हैं। अंग-अंग दलित ललित फूले किंसुक-से, हने भट लाखन लखन जातुधानके। मारि कै, पछारि कै, उपारि भुजदंड चंड, खंडि-खंडि डारे ते बिदारे हनुमानके ॥ कूदत कबंधके कदंब बंब-सी करत, धावत दिखावत हैं लाघौ राघौबानके। तुलसी महेसु, विधि, लोकपाल, देवगन, देखत बेवान चढ़े कौतुक मसानके ॥४८॥ लक्ष्मणजीके द्वारा मारे हुए रावणके लाखों वीरोंका अङ्ग-अङ्ग घायल हो गया, जिससे वे फूले हुए सुन्दर पलाशके समान मालूम होते हैं। (और कुछ वीरोंको) हनुमान्‌जीने मारकर, पछाड़कर, उनके प्रबल भुजदण्डोंको उखाड़कर, विशीर्णकर तथा खण्ड-खण्ड करके डाल दिया। कबन्धोंके झुंड बंबं शब्द करते कूदते फिरते हैं और दौड़-दौड़कर मानो श्रीरामचन्द्रके बाणोंकी शीघ्रता दिखाते हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि उस समय शिव, ब्रह्मा (आठों) लोकपाल और (अन्य) देवगण भी विमानोंपर चढ़े रणभूमिका तमाशा देखते हैं। लोथिन सों लोहूके प्रबाह चले जहाँ-तहाँ, मानहुँ गिरिन्ह गेरु-झरना झरत हैं। श्रोनितसरित घोर, कुंजर-करारे भारे, कूलतें समूल बाजि-बिटप परत हैं॥ क० ७—

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