भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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कवितावली ९६ धीरु रघुबीरको बीरु रनबाँकुरो · हाँकि हनुमान कुलि कटकु कूट्यो ॥४६॥ जैसे मतवाले हाथियोंके झुंडको देखकर सिंह पर्वतपरसे उनपर टूट पड़ता है, वैसे ही राक्षसोंके समूहको देखकर हनुमान्‌जी उनपर झपट पड़े । चपतोंकी विकट चोटसे और पाँव पकड़कर पृथ्वीपर पछाड़नेसे सब वीर निःशेष हो गये और सबका बल जाता रहा । गोसाईंजी कहते हैं कि वीरोंके पृथ्वीपर गिरनेसे पृथ्वी धड़कने लगी और वीरोंको गिरते-गिरते स्यारोंने इस प्रकार लूट लिया जैसे उठती हुई पैठको लुटेरे लूट लेते हैं । श्रीरामचन्द्रके धीर-वीर रणबाँकुरे हनुमान्‌जीने ललकार-ललकारकर सारी सेनाकी कुन्दी कर दी । छप्पै कतहुँ बिटप-भूधर उपारि परसेन बरषत । कतहुँ बाजिसों बाजि मर्दि, गजराज करषत ॥ चरनचोट चटकन चकोट अरि-उर-सिर बज्रत । बिकट कटकु बिदरत बीरु बारिदु जिमि गज्जत ॥ लंगूर लपेटत पटकि भट, 'जयति राम, जय !' उच्चरत । तुलसीस पवननंदनु अटल जुद्ध क्रुद्ध कौतुक करत ॥४७॥ वे कहीं तो वृक्ष और पर्वत उखाड़कर शत्रुसेनापर बरसाते हैं, कहीं घोड़ेसे घोड़ेको मसल डालते हैं और कहीं हाथियोंको घसीट-घसीटकर मारते हैं । उनके लात और थप्पड़की चोट शत्रुओंकी छाती और सिरपर बजती है । वे वीरवर उस कठिन सेनाका संहार करते हुए मेघके समान गरजते हैं । योद्धाओंको पूँछमें लपेटकर (पृथ्वीपर) पटकते हुए वे 'जय राम', 'जय राम'