कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९९ लंकाकाण्ड जटाधारी जोगिनियोंके झुंड-के-झुंड तपस्विनियोंकी भाँति समररूपी नदीमें स्नानकर किनारे-किनारे बैठी हैं। वे गूदे (मांस) को रुधिरसे सान-सानकर सत्तूके समान खा रही हैं और कोई-कोई प्रेत उसे घोल-घोलकर पी जाते हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि भूतनाथ भैरव भूत और बेतालोंको साथ लिये उनकी ओर देख-देखकर हाथ-से- हाथ मिला हँस रहे हैं। राम-सरासन तें चले तीर रहे न सरीर, हड़ावरि फूटीं। रावन धीर न पीर गनी, लखि लै कर खप्पर जोगिनि जूटीं।। श्रोनित-छीट-छटानि जटे तुलसी प्रभु सोहैं, महाछवि छूटी। मानो मरकत-सैल बिसाल में फैलि चलीं बर बीरबहूटीं ॥५१॥ श्रीरामचन्द्रके धनुषसे छूटकर बाण रावणके शरीरमें अटकते नहीं, अस्थिपञ्जरको फोड़कर निकल जाते हैं। तो भी धीर रावण इस पीड़ाको कुछ भी नहीं गिनता। यह देखकर जोगिनियाँ हाथमें खप्पर लेकर (रक्तपानार्थ) जुट गयीं। रुधिरके छींटोंकी छटासे युक्त होकर तुलसीदासके प्रभु (भगवान् श्रीरामचन्द्र) बड़े सुहावने मालूम होते हैं। उनकी सुन्दर छवि ऐसी मालूम होती है, मानो मरकतके विशाल पर्वतपर सुन्दर वीरबहूटियाँ फैल गयी हों। लक्ष्मणमूर्च्छा मानी मेघनादसों प्रचारि भिरे भारी भट, आपने-अपन पुरुषारथ न ढील की। घायल लखनलालु लखि बिलखाने रामु, भई आस सिथिल जगन्निवास-दीलकी ॥ भाईको न मोहु, छोहु सीयको न तुलसीस,