भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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९१ लंकाकाण्ड जिनके महाप्रचण्ड भुजदण्ड दुर्ग (किले) से भी दुर्गम और पहाड़से भी विशाल हैं, जो लाखोंमें प्रबल हैं और जिनका तेज बड़ा तीक्ष्ण है तथा जो शूर-समाजमें बिजलीके समान गिने जाते हैं, उन रणबाँकुरे प्रसिद्ध पराक्रमी निशाचरोंको हठी हनुमान्‌जीने प्रचारकर मारा है और जो वीर बहुत चोट खाये हुए घूम रहे हैं, उनको श्रीरामचन्द्रजी नाम ले-लेकर अपने भाई लक्ष्मणजीको दिखला रहे हैं। हाथिन सों हाथी मारे, घोरेसौं सँघारे घोरे, रथनि सों रथ बिदरनि बलवानकी। चंचल चपेट, चोट चरन, चकोट चाहें, डहरानीं फौजें भहरानीं जातुधानकी ॥ बार-बार सेवक-सराहना करत रामु, 'तुलसी' सराह रीति साहेब सुजानकी। लाँबी लूम लसत, लपेटि पटकत भट, देखौ देखौ, लखन ! लरनि हनुमानकी ॥४०॥ हाथियोंसे हाथियोंको मार डाला है, घोड़ोंसे घोड़ोंका संहार कर दिया और रथोंसे मजबूत रथोंको (टकराकर) तोड़ डाला। हनुमान्‌जीकी चञ्चल चपेट, लातोंकी चोट और चुटकी काटना देखकर निशाचरोंकी सेनाएँ घबड़ा गयीं और चक्कर खाकर गिरने लगीं। श्रीराम बार-बार अपने सेवककी सराहना करते हुए कहते हैं—लक्ष्मण! तनिक हनुमान्‌जीका युद्धकौशल तो देखो, उनकी लंबी पूँछ कैसी शोभायमान है जिसमें लपेट-लपेटकर वे राक्षस वीरोंको पटक रहे हैं। गोसाईं जी भी अपने सुजान स्वामीकी (सेवकवत्सलताकी) रीतिकी सराहना करते हैं।