कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ९० लूम लपेटि, अकास निहारि कै, हाँकि हठी हनुमान चलाए । सूखि गे गात, चले नभ जात, परे भ्रमवात, न भूतल आए ॥३७॥ जिन विशाल वीर निशाचरोंको विकराल समझकर कालने भी नहीं खाया उन रणकर्कश बलवानोंको केसरीकिशोरने अपने दावमें पड़े पाया और उन्हें ललकारकर हठी हनुमान्जीने आकाश- की ओर देखते हुए पूँछमें लपेटकर फेंक दिया । उनके शरीर सूख गये और बवंडरमें पड़नेसे आकाशमें चले जा रहे हैं, लौटकर पृथ्वीपर नहीं आते । जो दससीसु महीधर ईसको बीस भुजा खुलि खेलनिहारो । लोकप, दिग्गज, दानव, देव, सबै सहमे सुनि साहसु भारो ॥ बीर बड़ो बिरुदैत बली, अजहूँ जग जागत जासु पँवारो । सो हनुमान हन्यो मुठिकाँ गिरि गो गिरिराजु ज्यों गाजको मारो॥ जो रावण, शिवजीके पर्वत (कैलास) को बीसों भुजाओंसे उठाकर स्वच्छन्दतापूर्वक खेलनेवाला था, जिसके भारी साहसको सुनकर लोकपाल, दिक्पाल, दैत्य और देवगण सभी डर गये थे; जो बड़ा यशस्वी और बलशाली वीर था तथा जिसकी कीर्तिकथा आज भी जगत्में गायी जाती है उसी रावणको हनुमान्जीने मुक्केसे मारा तो जैसे वज्रके प्रहारसे पर्वत गिर जाता है, उसी प्रकार गिर गया । दुर्गम दुर्ग, पहारतें भारे, प्रचंड महा भुजदंड बने हैं। लक्खमें पक्खर, तिक्खन तेज, जे सूरसमाजमें गाज गने हैं ॥ ते बिरुदैत बली रनबाँकुरे हाँकि हठी हनुमान हने हैं। नामु लै रामु देखावत बंधुको, घूमत घायल घायँ घने हैं ॥३९॥