भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

कवितावली ९२ दबकि दबोरे एक, वारिधिमें बोरे एक, मगन महीमें, एक गगन उड़ात हैं। पकरि पछारे कर, चरन उखारे एक, चीरि-फारि डारे, एक मीजि मारे लात हैं ॥ ‘तुलसी’ लखत, रामु, रावन, विबुध, बिधि, चक्रपानि, चंडीपति, चंडिका सिहात हैं। बड़े-बड़े बानइत बीर बलवान बड़े, जातुधान-जूथप निपाते बातजात हैं ॥४१॥ उन्होंने किसीको चुपकेसे दबोच डाला, किसीको समुद्रमें डुबा दिया, किसीको पृथ्वीमें गाड़ दिया, किसीको आकाशमें उड़ा दिया, किसीको हाथ पकड़कर पछाड़ दिया, किसीके पैर उखाड़ लिये, किसीको चीर-फाड़ डाला और किसीको लातसे मसलकर मार दिया। गोसाईंजी कहते हैं कि उन्हें देखकर श्रीराम और रावण, देवगण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव और चण्डी मन-ही-मन प्रशंसा कर रहे हैं। हनुमान्‌जीने बड़े-बड़े यशस्वी वीर और बलवान् निशाचर- सेनापतियोंको मार डाला। प्रबल प्रचंड बरिबंड बाहुदंड बीर धाए जातुधान, हनुमानु लियो घेरि कै। महाबलपुंज कुंजरारि ज्यों गरजि, भट जहाँ-तहाँ पटके लँगूर फेरि-फेरि कै ॥ मारे लात, तोरे गात, भागे जात हाहा खात, कहैं ‘तुलसीस ! राखि’ रामकी सौं टेरि कै।