भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

९३ लंकाकांड ठहर-ठहर परे, कहारि-कहरि उठैं, हहरि-हहरि हरु सिद्ध हँसे हेरि कै ॥४२॥ तब जिनके भुजदण्ड बड़े उद्दण्ड हैं ऐसे बहुत-से प्रबल और प्रचण्ड राक्षसवीर दौड़े और उन्होंने हनुमान्जीको घेर लिया। किन्तु महाबलराशि वीर हनुमान्जी सिंहके समान गरजकर उन वीरोंको लाङ्गूल घुमा-घुमाकर जहाँ-तहाँ पटकने लगे। उन्होंने मारे लातोंके राक्षसोंके अङ्ग-प्रत्यङ्ग तोड़ डाले। वे गिड़गिड़ाते हुए भागे जाते हैं और श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई देकर कहते हैं कि हे तुलसीदासके स्वामी हनुमान् ! हमारी रक्षा करो। वे ठौर-ठौर पड़े कराह-कराह- कर उठते हैं; उन्हें देख-देखकर शिवजी और सिद्धगण ठहाका मारकर हँसने लगे। जाकी बाँकी बीरता सुनत सहमत सूर, जाकी आँच अबहूँ लसत लंक लाह-सी। सोई हनुमानु बलवान बाँको बानइत, जोहि जातुधान-सेना चल्यो लेत थाह-सी ॥ कंपत अकंपन, सुखाय अतिकायकाय, कुंभऊकरन आइ रह्यो पाइ आह-सी। देखें गजराज मृगराजु ज्यों गरजि धायो, बीर रघुबीरको समीरस्नू साहसी ॥४३॥ जिसकी बाँकी वीरताको सुनकर वीरलोग भय खाते हैं, जिसकी लगायी हुई आँचसे आज भी लंका लाह-सी मालूम होती है, वही बाँके बानेवाले बलवान् हनुमान्जी निशाचरोंकी सेनाको देखकर उसकी थाह-सी लेते चले। उस समय अकम्पन (रावणका पुत्र)