भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 228 में से

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पृष्ठ 97

कवितावली ९४ काँपने लगा, अतिकाय ( रावणके पुत्र ) का शरीर सूख गया और कुम्भकर्ण भी आकर आह-सी लेकर पड़ रहा । जैसे गजराजोंको देखकर सिंह दौड़ता है, वैसे ही श्रीरामचन्द्रजीके धीर साहसी पवनपुत्र ( हनुमान्जी ) उन्हें देखते ही गरजकर दौड़े । झूलना मत्त-भट-मुकुट-दसकंठ-साहस-सेल- सृंग-बिदरनि जनु बज्र-टाँकी । दसन धरि धरनि चिक्करत दिग्गज, कमठु, सेषु संकुचित, संकित पिनाकी ॥ चलत महि-मेरु, उच्छलत सायर सकल, बिकल बिधि बधिर दिसि-बिदिसि झाँकी । रजनिचर-घरनि घर गर्भ-अर्भक स्रवत, सुनत हनुमानकी हाँक बाँकी ॥४४॥ जो उन्मत्त वीरोंमें शिरोमणि रावणके साहसरूपी शैल- शिखरको विदारण करनेके लिये मानो वज्रकी टाँकी हैं, उन हनुमान्जीकी भयंकर ललकारको सुनकर दिक्पाल दाँतोंसे पृथ्वीको दबाकर चिक्कारने लगते हैं, कच्छप और शेषजी ( भयके मारे ) सिकुड़ जाते हैं और शिवजी भी सन्देहमें पड़ जाते हैं, पृथ्वी तथा सुमेरु विचलित हो जाते हैं, सातों समुद्र उछलने लगते हैं, ब्रह्माजी व्याकुल तथा बधिर होकर दिशा-विदिशाओंको झाँकने लगते हैं और घर-घरमें निशाचरोंकी स्त्रियोंके गर्भपात होने लगते हैं ।

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