भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 90

८९ लंकाकाण्ड फिर (दोनों दल) क्रोधित हो तमककर तथा एक दूसरेकी ओर ताककर भारी युद्धमें भिड़ गये। सेनापतिलोग अपने-अपने दलके वीरोंकी सराहना करने लगे। झुंड-के-झुंड रुंड (बिना सिरके धड़) झूम-झूमकर झुकरे-से (परस्पर युद्ध हुए-से) नाचने लगे और श्रीरामचन्द्रके वीर युद्धमें सुमार (कठिन मार) मारने लगे।

तीखे तुरंग कुरंग सुरंगनि साजि चढ़े छाँटि छैल छबीले। भारी गुमान जिन्हें मनमें, कबहूँ न भए रनमें तन ढीले॥ तुलसी लखि कै गज केहरि ज्यों झपटे, पटके सब सूर सलीले। भूमि परे भट घूमि कराहत, हाँकि हने हनुमान हठीलें ॥३२॥

जिनके मनमें बड़ा गर्व था और रणमें जिनका शरीर कभी ढीला नहीं हुआ था, ऐसे चुने हुए छबीले छैल हरिणके समान तेज भागनेवाले एवं सुन्दर रंगवाले घोड़ोंको साजकर सवार हुए। गोसाईंजी कहते हैं कि जैसे हाथीको देखकर सिंह झपटता है उसी प्रकार हनुमान्‌जी लीलाहीसे सब वीरोंको झपटकर पटकने लगे और वे घूम-घूमकर पृथ्वीपर गिरने और कराहने लगे। इस प्रकार हठीले हनुमान्‌जी ललकार-ललकारकर राक्षसोंका वध करने लगे।

सूर सँजोइल साजि सुवाजि, सुसेल धरैं बगमेल चले हैं। भारी भुजा भरी, भारी सरीर, बली विजयी सब भाँति भले हैं॥ 'तुलसी' जिन्ह धाएँ धुकै धरनी, धरनीधर धौर धकान हले हैं। ते रन-तीखन लखन लाखन दानि ज्यों दारिद दाबि दले हैं ३३