कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ८६ रामरुख निरखि हरष्यो हियँ हनुमानु, मानो खेलवार खोली सीसताज बाजकी ॥३०॥ तब रावणने क्रोधित होकर युद्धके लिये बड़े यशस्वी वीरोंको बुलाया, जो युद्धकी तैयारीकी सारी रीति जानते थे । चतुरङ्गिणी सेनाने प्रस्थान किया, बड़े तपाक से नगाड़े बजने लगे; उस समय राक्षसराज (रावण) की सेना सराहने योग्य थी । गोसाईंजी कहते हैं—उस सेनाको देखकर वानर और भालू किलकारी मारने लगे; जैसे कंगाल सुन्दर अन्नकी परोसी हुई पत्तल देखकर ललचाते हैं । श्रीरामचन्द्रका इशारा पाकर हनुमान्जी हर्षित हुए, मानो खिलाड़ी (शिकारी) ने बाजकी टोपी खोल दी (अर्थात् उसे शिकारके लिये स्वतन्त्रता दे दी) । साजि कै सनाह-गजगाह सउछाह दल, महाबली धाए बीर जातुधान धीरके । इहाँ भालु-बंदर बिसाल मेरु-मंदर-से, लिए सैल-साल तोरि नीरनिधितीरके ॥ तुलसी तमकि-ताकि भिरे भारी जुद्ध क्रुद्ध, सेनप सराहे निज निज भट भीरके । झुंडनके झुंड झूमि-झूमि झुकरे-से नाचैं, समर सुमार सूर मारैं रघुबीरके ॥३१॥ धीर रावणके महाबली वीरोंका दल कवच और गजगाह (हाथियोंकी झूल) साजकर उत्साहपूर्वक चला । यहाँ मेरु और मन्दर पर्वतके समान विशाल वानर और भालुओंने समुद्रके किनारेके पर्वत और शालवृक्ष उपाड़ लिये । गोसाईंजी कहते हैं—