कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबड़े-बड़े सजीले वीर सुन्दर घोड़ोंको सजाकर और तीखे भाले धारणकर घोड़ोंकी बागडोर छोड़कर (अथवा मिलाकर बराबर- बराबर) चले। उनकी बड़ी-बड़ी भरी हुई (मांसल) भुजाएँ और भारी शरीर हैं, वे सब प्रकार बली, विजयी और सुहावने मालूम होते हैं। गोसाईंजी कहते हैं—जिनके दौड़नेसे पृथ्वी काँपने लगती है और कठिन धक्कोंसे पर्वत डोलने लगते हैं, ऐसे रणमें तीक्ष्ण लाखों वीरोंको युद्धभूमिमें लक्ष्मणजीने इस प्रकार पलकके नष्ट कर दिया जैसे कोई दानी पुरुष [बहुत-सी सम्पत्ति दान-कर] दरिद्रताको नष्ट कर देता है।
गहि मंदर बंदर-भालु चले, सो मनो उनये घन सावनके। 'तुलसी' उत झुंड प्रचंड झुके, झपटैं भट जे सुरदावनके ॥ बिरुझे विरुदैत जे खेत अरे, न टरे हठि वैरु बढ़ावनके । रन मारि मची उपरी-उपरा भलें बीर रघुपति-रावनकें ॥३४॥
वानर और भालु पर्वतोंको लेकर इस प्रकार चले मानो सावनकी घटा घिर आयी हो। गोसाईंजी कहते हैं कि उधर देवताओंका नाश करनेवाले (रावण) के प्रचण्ड वीर भी झुंड-के-झुंड क्रुद्ध होकर झपटने लगे। हठपूर्वक वैर बढ़ानेवाले (रावण) के बहुत-से यशस्वी वीर जो मैदानमें अड़े थे वे एक दूसरेसे भिड़ गये और टालनेसे भी नहीं टलते थे। इस प्रकार श्रीरामचन्द्र और रावणके वीरोंमें ऊपरा-ऊपरी करके युद्धस्थलमें खूब लड़ाई छिड़ गयी।
सर-तोमर-सेलसमूह पँवारत, मारत बीर निसाचरके । इत तें तरु ताल-तमाल चले, खर खंड प्रचंड महीधरके ॥