कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२७ उत्तरकाण्ड मति रामहि सों, गति रामहि सों, रति रामसों, रामहि को बलु है। सबकी न कहै, तुलसीके मतें इतनो जग जीवनको फलु है ॥३७॥ श्रीराम और जानकीजीका अनुपम सौन्दर्य नेत्ररूपी मछलियों- के लिये अगाध जल है । कानोंमें श्रीरामकी कथा, मुखसे रामका नाम और हृदयमें रामजीका ही स्थान है । बुद्धि भी राममें लगी हुई है, रामहीतक गति है, रामहीसे प्रीति है और रामहीका बल है । और सबकी बात तो नहीं कहता, परन्तु तुलसीदासके मतमें तो जगत्में जीनेका फल यही है । दसरथके दानिसिरोमनि राम ! पुरानप्रसिद्ध सुन्यो जसु मैं । नर नाग सुरासुर जाचक जो, तुमसों मनभावत पायो न कैं ॥ तुलसी कर जोरि करै विनती, जो कृपा करि दीनदयाल सुनैं । जैहि देह सनेहु न रावरे सों असि देह धराइ कै जायँ जियैं ॥३८॥ हे दशरथजीके पुत्र दानियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ! मैंने आपका पुराणोंमें प्रसिद्ध यश सुना है । नर, नाग, सुर तथा असुरोंमें जितने भी आपके याचक बने, उनमेंसे किसने आपसे अपना मनोवाञ्छित पदार्थ नहीं पाया ? यदि दीनवत्सल प्रभु राम कृपा करके सुनें तो तुलसीदास हाथ जोड़कर विनय करता है कि जिस देहसे आपके प्रति स्नेह न हो ऐसा देह धारण कर जीवित रहना व्यर्थ है । झूठो है, झूठो है, झूठो सदा जगु, संत कहंत, जे अंतु लहा है । ताको सहै सठ ! संकट कोटिक, काढ़त दंत, करंत हहा है ॥ जानपनीको गुमानु बड़ो, तुलसीके बिचार गँवार महा है । जानकीजीवनु जान न जान्यो तौ जान कहावत जान्यो कहा है ३९