भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

कवितावली १२८ तुलसीदासजी अपने लिये कहते हैं कि अरे दुष्ट ! जिन संतोंने इस संसारकी थाह पा ली है, वे कहते हैं कि संसार झूठा है, झूठा है, झूठा है; परन्तु तू उसीके लिये करोड़ों संकट सहता है और दाँत निकालकर हाय-हाय करता है । तुझे अपने ज्ञानीपनेका बड़ा अभिमान है, परन्तु तुलसीके विचारसे तो तू महागँवार है । यदि तूने ज्ञानके द्वारा जानकीजीवन ( श्रीरामचन्द्रजी ) को नहीं जाना तो तूने ज्ञानी कहलाते हुए भी ( वस्तुतः ) क्या जाना ? [ अर्थात् कुछ भी नहीं जाना । ] तिन्ह तें खर, सूकर, स्वान भले, जड़ता बस ते न कहैं कछु वै । 'तुलसी' जेहि रामसों नेहु नहीं, सो सही पसु पूँछ, बिषान न द्वै ॥ जननी कत भार मुई दस मास, भई किन बाँझ, गई किन च्वै । जरि जाउ सो जीवनु, जानकीनाथ ! जियै जगमें तुम्हरो बिनु है ॥ गोसाईंजी कहते हैं कि जिन्हें श्रीरामजीसे स्नेह नहीं है, वे सचमुच पशु ही हैं, उनके केवल एक पूँछ और दो सींगोंकी कसर है । उनसे तो गधे और सूअर भी अच्छे हैं, क्योंकि वे बेचारे कुछ जड़ होनेके कारण कहते तो नहीं । उनकी माँ दस महीनेतक उनके भारसे क्यों मरी ? बाँझ क्यों नहीं हो गयी ? अथवा उसका गर्भ ही क्यों नहीं गिर गया ? हे जानकीनाथ ! जो पुरुष संसारमें तुम्हारा हुए बिना जीता है उसका जीवन जल जाय ( जला देनेके योग्य है ) । गज-बाजि-घटा, भले भूरि भटा, बनिता, सुत भौंह तकैं सब वै । धरनी, धनु, धाम सरीरु भलो, सुरलोकहु चाहिइहै सुखु स्वै ॥ सब फोकट साटक है तुलसी, अपनो न कछू सपनो दिन द्वै । जरि जाउ सो जीवनु जानकीनाथ ! जियै जगमें तुम्हरो बिनु है ४१