भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 228 में से

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१२९. उत्तरकाण्ड हाथी-घोड़ोंके समूह-के-समूह हैं, अनेक अच्छे-अच्छे वीर हैं, स्त्री-पुरुष सब भौंहें ताकने रहते हैं; पृथ्वी, धन, घर, शरीर—सब कुछ अच्छे हैं; देवलोकसे भी यह सुख बढ़कर है, किन्तु गोसाईंजी कहते हैं कि यह सब निरर्थक और निःसार हैं, अपना कुछ नहीं है। सब दो दिनका स्वप्न है। हे जानकीनाथ ! जो संसारमें तुम्हारा हुए बिना जीता है, उसका जीवन जल जाय। सुरराज-सो राज-समाजु, समृद्धि विरंचि, धनाधिप-सो धनु भो। पवमानु-सो, पावकु-सो, जमु, सोमु-सो, पूषनु-सो, भवभूषनु भो॥ करि जोग, समीरन साधि, समाधि कै धीर बड़ो, बसहू मनु भो। सब जाय, सुभायँ कहै तुलसी, जो न जानकीजीवनको जनु भो ४२ इन्द्रके समान राजसामग्री हो गयी, ब्रह्माके समान ऐश्वर्य हो गया और कुबेरके समान धन हो गया तथा वायुके समान (वेगवान्), अग्निके समान (तेजस्वी), यमराजके समान दण्डधारी, चन्द्रमाके समान शीतल एवं आह्लादकारी और सूर्यके समान संसारको प्रकाशित करनेवाला और संसारका भूषण बन गया हो; वायुको साधकर (प्राणायाम कर) योगाभ्यास करता हुआ समाधिके द्वारा बड़ा धीर हो गया हो और मन भी वशमें हो गया हो, तो भी गोसाईंजी सच्चे भावसे कहते हैं—यदि जानकीनाथका सेवक न हुआ तो सब व्यर्थ है। कामु-से रूप, प्रताप दिनेसु-से, सोमु-से सील, गनेसु-से मानें। हरिचंदु-से साँचे, बड़े विधि-से, मघवा-से, महीप विषै-सुख-साने॥ सुक-से मुनि, सारद-से वकता, चिरजीवन लोमस तें अधिकाने। ऐसे भए तौ कहा 'तुलसी', जो पै राजिवलोचन रामु न जाने।४३। क० ९-

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