भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 133

कवितावली १३० यदि मनुष्यने कमलनयन भगवान् श्रीरामको नहीं जाना तो वह रूपमें कामदेव-सा, प्रतापमें सूर्य-सा, शीलमें चन्द्रमाके समान, मानमें गणेशके सदृश तथा हरिश्चन्द्र-सा सच्चा, ब्रह्मा-जैसा महान्, विषय-सुखमें आसक्त, इन्द्रके समान राजा, शुकदेव-मुनि-सा महात्मा, शारदाके सदृश वक्ता और लोमशसे भी अधिक चिरजीवी हो जाय तो भी ऐसा होनेसे क्या लाभ हुआ ? झूमत द्वार अनेक मतंग जँजीर-जरे, मद-अंबु चुचाते। तीखे तुरंग मनोगति-चंचल, पौनके गौनहु तें बढ़ि जाते ॥ भीतर चंद्रमुखी अवलोकति, बाहर भूप खरे न समाते। ऐसे भए तौ कहा, तुलसी! जो पै जानकीनाथके रंग न राते॥४४॥ द्वारपर जंजीरोंसे जकड़े हुए तथा जिनके गण्डस्थलसे मद चू रहा है, ऐसे अनेकों हाथी झूमते हों और मनके समान तीव्र वेगवाले चञ्चल घोड़े हों, जो वायुकी गतिसे भी बढ़ जाते हों, घरमें चन्द्रमुखी स्त्री देखती हो, बाहर बड़े-बड़े राजा खड़े हों, जो (बहुत अधिक होनेके कारण) भीतर न समा सकते हों— गोसाईंजी कहते हैं कि यदि जानकीपति (श्रीरामचन्द्र) के रंगमें न रँगा तो ऐसा होनेपर भी क्या हुआ ? राज सुरेस पचासकको बिधिके करको जो पटो लिखि पाए। पूत सपूत, पुनीत प्रिया, निज सुंदरताँ रतिको मदु नाएँ ॥ संपति-सिद्धि सबै 'तुलसी' मनकी मनसा चितवैं चितु लाएँ। जानकीजीवनु जाने बिना जग ऐसेउ जीव न जीव कहाए ॥४५॥ पचासों इन्द्रके (राज्यके) समान राज्यका ब्रह्माजीके हाथका लिखा हुआ पट्टा मिल गया हो, सपूत लड़के हों, पतिव्रता स्त्री हो, जो अपनी सुन्दरतामें रतिके मदको भी नीचा दिखानेवाली हो,