भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 134

सब प्रकारकी सम्पत्तियाँ और सिद्धियाँ उसके मनकी रुखको ध्यानपूर्वक देखती हुई खड़ी हों; किन्तु गोसाईंजी कहते हैं कि यदि जानकीनाथ (श्रीरामचन्द्र) को न जाना तो ऐसे जीव भी वास्तवमें जीव कहलानेके योग्य नहीं हैं।

कुसगात ललात जो रोटिनको, घरवात घरैं खुरपा-खरिया । तिन्ह सोनेके मेरुसे ढेर लहे, मनु तौ न भरो, घरु पै भरिया ॥ 'तुलसी' दुखु दूनो दसा दुहुँ देखि, कियो मुखु दारिदको करिया । तजि आस भो दासु रघुप्पतिको, दसरत्थको दानि दया-दरिया४६

जिनका शरीर अत्यन्त दुबला है, जो रोटीके लिये बिल- बिलाते फिरते हैं और जिनके घरमें एक खुरपा और घास बाँधनेकी जाली ही सारी पूँजी है, उन्हें यदि सुमेरु पर्वतके बराबर सोनेके ढेर भी मिल गये, तो इससे उनका घर तो भर गया, परन्तु मन नहीं भरा। गोसाईंजी कहते हैं कि मैंने दोनों अवस्थाओंमें दूना दुःख देखकर दरिद्रताका मुख काला कर दिया और सब आशा त्यागकर दशरथसुवन श्रीरामचन्द्रका दास हो गया, जो दयाके मानो दरिया हैं।

को भरिहै हरिकैं रितएँ, रितवै पुनि को, हरि जौ भरिहै । उथपै तेहि को, जेहि रामु थपै, थपिहै तेहि को, हरि जौ टरिहै ॥ तुलसी यहु जानि हिएँ अपनें सपनें नहि कालहु तें डरिहै । कुमयाँ कछु हानि न औरन कीं, जो पै जानकीनाथु मया करिहै ४७

जिसको भगवान्‌ने खाली कर दिया उसे कौन भर सकता है और जिसको भगवान् भर देंगे उसे कौन खाली कर सकता है। जिसे श्रीरामचन्द्रजी स्थापित कर देते हैं उसे कौन उखाड़