भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

कवितावली १३२ सकता है और जिसे वे उखाड़ेंगे उसे कौन स्थापित कर सकता है। तुलसीदास अपने हृदयमें यह जानकर स्वप्नमें भी कालसे भी नहीं डरेगा। क्योंकि यदि जानकीनाथ श्रीरामचन्द्र कृपा करेंगे तो औरोंकी अकृपासे कुछ भी हानि नहीं होगी ! ब्याल कराल, महाविष, पावक, मत्तगयंदहु के रद तोरे। साँसति संकि चली, डरपे हुते किंकर, ते करनी मुख मोरे ॥ नेकु बिषादु नहीं प्रहलादहि कारन केहरिके बल हो रे। कौनकी त्रास करै तुलसी जोपै राखिहै रामु, तौ मारिहै को रे ४८ विकराल सर्प, भयंकर विष, अग्नि और मतवाले हाथियोंके दाँतोंको भी तोड़ डाला। कष्ट भी सशङ्कित होकर भाग गया, जो सेवक (राजासे) डरते थे; उन्होंने भी (आज्ञापालनस्वरूप) कर्तव्यसे मुँह मोड़ लिया। तो भी प्रह्लादको कुछ भी विषाद नहीं हुआ; क्योंकि वह नृसिंह भगवान्‌के बलके आश्रित था। अतः अब तुलसीदास ही किसका भय करे। यदि रामजी रक्षा करेंगे तो उसे कौन मार सकता है। कृपाँ जिनकीं कछु काजु नहीं, न अकाजु कछू जिनके मुख मोरें। करैं तिनकी परवाहि ते, जो बिनु पूँछ-विषान फिरैं दिन दौरैं ॥ तुलसी जेहिके रघुनाथु से नाथु, समर्थ सुसेवत रीझत थोरें। कहा भवभीर परी तेहि धौं, बिचरै धरनीं तिनसों तिनु तोरें॥४९॥ जिनकी कृपासे कुछ काम नहीं बनता और न जिनके मुख मोड़नेसे कुछ हानि ही होती है, उनकी परवा वही लोग करेंगे जो बिना सींग-पूँछके होकर भी सर्वदा दौड़े फिरते हैं [अर्थात् पशु न होनेपर भी अपने वास्तविक लक्ष्यको छोड़कर रात-दिन