भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

१३३ उत्तरकाण्ड पेटकी ही चिन्तामें लगे रहते हैं ] । गोसाईंजी कहते हैं कि जिसके श्रीरामचन्द्रके समान समर्थ स्वामी हैं, जो थोड़ी-सी सेवा करनेपर ही रीझ जाते हैं, उसे संसारकी क्या चिन्ता पड़ी है, वह तो ऐसे लोगोंसे सम्बन्ध तोड़कर पृथ्वीपर विचरता है । कानन, भूधर, वारि, बयारि, महाविषु, ब्याधि, दवा-अरि घेरें । संकट कोटि जहाँ 'तुलसी', सुत, मातु, पिता, हित, बंधु न नेरे ॥ राखिहैं रामु कृपालु तहाँ, हनुमानु से सेवकु हैं जेहि केरे । नाक, रसातल, भूतलमें रघुनायकु एकु सहायकु मेरे ॥५०॥ वनमें, पर्वतपर, जलमें, आँधीमें, महाविष खा लेनेपर, रोगमें, अग्नि और शत्रुसे घिर जानेपर तथा गोसाईंजी कहते हैं, जहाँ करोड़ों संकट हों और माता-पिता, पुत्र, मित्र और भाई-बन्धु कोई समीप न हों, वहाँ भी दयालु भगवान् राम, जिनके हनुमान्-सा-जैसे सेवक हैं, रक्षा करेंगे । आकाश, पाताल और पृथ्वीमें एक श्रीरघुनाथजी ही मेरे सहायक हैं । जबै जमराज-रजायततें मोहि लै चलिहैं भट बाँधि नटैया । तातु न मातु, न स्वामि-सखा, सुत-बंधु बिसाल बिपत्ति-बँटैया ॥ साँसति घोर, पुकारत आरत कौन सुनै, चहुँ ओर डटैया । एकु कृपाल तहाँ 'तुलसी' दसरत्थको नंदनु बंदि-कटैया ॥५१॥ जब यमराजकी आज्ञासे मेरे गलेको बाँधकर यमदूत मुझे ले चलेंगे उस समय वहाँ न बाप, न माँ, न स्वामी, न मित्र, न पुत्र और न भाई ही उस भारी विपत्तिको बाँटनेवाले होंगे । वहाँ घोर कष्ट सहना होगा । उस आर्त्त पुकारको सुनेगा भी कौन ? चारों ओर डाँटनेवाले [ यमदूत ] ही होंगे । गोस्वामीजी कहते हैं कि

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस) · पृष्ठ 136, कुल 228 में से · BharatKosha