भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

कवितावली १३४ वहाँ केवल एक दयानिधान दशरथ-कुमार ही बन्धन काटनेवाले होंगे। जहाँ जमजातना, घोर नदी, भट कोटि जलचर दंत-टेवैंया। जहँ धार भयंकर, वार न पार, न बोहितु नाव, न नीक खेवैंया॥ 'तुलसी' जहँ मातु-पिता न सखा, नहि कोउ कहूँ अवलंब-देवैया। तहाँ बिनु कारन रामु कृपाल विसाल भुजा गहि काढ़ि लेवैंया ५२ जहाँ यमयातना देनेवाले करोड़ों यमदूत हैं, घोर वैतरणी नदी है, जिसमें दाँतोंकी धार तेज करनेवाले (काटनेवाले) जलजन्तु हैं, जिसकी भयङ्कर धारा है, और जिसका कोई वार-पार नहीं है, जिसमें न जहाज है, न नाव और न सुचतुर नाविक ही है; इसके सिवा जहाँ माता, पिता, सखा अथवा कोई अवलम्बन देनेवाला भी नहीं है, वहाँ श्रीगोसाईंजी कहते हैं, बिना ही कारण कृपा करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ही अपनी विशाल भुजासे पकड़कर निकाल लेनेवाले हैं। जहाँ हित स्वामि, न संग सखा, वनिता, सुत, बंधु, न बापु, न मैया। काय-गिरा-मनके जनके अपराध सबै छल छाड़ि छमैया॥ तुलसी! तेहि काल कृपाल बिना दूजो कौन है दारुन दुःख दमैया। जहाँ सब संकट, दुर्घट सोचु, तहाँ मेरो साहेबु राखै रखैया ॥५३॥ श्रीगोसाईंजी कहते हैं कि जहाँ कोई हितैषी स्वामी नहीं है और न साथमें मित्र, स्त्री, पुत्र, भाई, बाप या माँ ही है वहाँ कृपालु श्रीरामचन्द्रके बिना अपने जनके शरीर, मन और वचनद्वारा किये हुए समस्त अपराधोंको छल छोड़कर क्षमा करनेवाला तथा उस दारुण दुःखका नाश करनेवाला दूसरा कौन हो सकता है ? जहाँ ऐसे-ऐसे सब प्रकारके संकट और दुर्घट सोच हैं वहाँ मेरे