कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३५ उत्तरकाण्ड स्वामी जगत्में रमण करनेवाले श्रीरामचन्द्र ही मेरी रक्षा करते हैं। तापसको बरदायक देव, सबै पुनि बैरु बढ़ावत बाढ़ैं । थोरेंहि कोपु, कृपा पुनि थोरेंहि, बैठि कै जोरत, तोरत ठाढ़ें ॥ ठोंकि-बजाइ लखे गजराज, कहाँ लौं कहौं केहि सों रद काढें । आरतके हित,नाथु अनाथके रामु सहाय सही दिन गाढ़ें ॥५४॥ देवतालोग तपस्वियोंको वर देनेवाले हैं, किन्तु बढ़नेपर वे सब वैर बढ़ाते हैं । थोड़ेहीमें कोप और थोड़ेहीमें कृपा करते हैं । वे बैठकर प्रीति जोड़ते और खड़े होते ही उसे तोड़ देते हैं ( अर्थात् उनकी प्रीति बहुत थोड़ी देर टिकनेवाली होती है ) । हम किस- किससे और कहाँतक दाँत निकालकर कहें ? गजराजने सबको ठोंक-बजाकर देख लिया, दुखियोंके मित्र, अनाथोंके नाथ तथा विपत्तिके दिनोंमें सच्चे सहायक श्रीरामचन्द्र ही हैं । जप, जोग, बिराग, महामख-साधन, दान, दया, दम कोटि करै । मुनि-सिद्ध, सुरेसु, गनेसु, महेसु-से सेवत जन्म अनेक मरै ॥ निगमागम-ग्यान, पुरान पढ़े, तपसानलमें जुगपुंज जरै । मनसों पनु रोपि कहै तुलसी, रघुनाथ विना दुख कौन हरै ॥ चाहे कोई जप, योग, वैराग्य बड़े-बड़े यज्ञानुष्ठान, दान, दया, इन्द्रिय-निग्रह आदि करोड़ों उपाय करे; मुनि, सिद्ध, सुरेश (इन्द्र), गणेश और महेश-जैसे देवताओंका अनेकों जन्मतक सेवन करते- करते मर जाय, वेद-शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करे और पुराणोंका अध्ययन करे, अनेकों युगोंतक तपस्याकी अग्निमें जलता रहे; परन्तु तुलसी मनसे प्रण रोपकर कहता है कि श्रीरामचन्द्रके बिना कौन दुःख दूर कर सकता है ?