कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३७ उत्तरकाण्ड पाप हरे, परिताप हरे, तनु पूजि भो हीतल सीतलताई । हंसु कियो बकतें, बलि जाउँ, कहाँ लौं कहौं करुना-अधिकाई ॥ कालु विलोकि कहैं तुलसी, मनमें प्रभुकी परतीति अघाई । जन्मु जहाँ, तहँ रावरे सों निवहैं भरि देह सनेह-सगाई ॥ तुलसीदासजी कहते हैं—हे श्रीराम ! आपने मेरे पाप नष्ट कर दिये, सारे सन्ताप हर लिये, शरीर पूज्य बन गया । हृदयमें शीतलता आ गयी । और मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ, आपने मुझे बगुले (दंभी) से हंस (विवेकी) बना दिया, आपकी कृपाकी अधिकताका कहाँतक वर्णन करूँ । अब समय देखकर तुलसी कहता है कि मेरे मनमें प्रभुका पूरा भरोसा है, अतः जहाँ कहीं भी मेरा जन्म हो वहाँ आपसे शरीर रहनेतक प्रेमके सम्बन्धका निर्वाह होता रहे । लोग कहैं, अरु हौंहु कहौं, जनु खोटो-खरो रघुनायकही को । रावरी राम ! बड़ी लघुता, जसु मेरो भयो सुखदायक हीको ॥ कै यह हानि सहौ, बलि जाउँ, कि मोहू करौ निज लायकहीको । आनि हिएँ हित जानि करौ, ज्यों हों ध्यानु धरौं धनु-सायकही को॥ लोग कहते हैं और मैं भी कहता हूँ कि खोटा या खरा मैं श्रीरामचन्द्रजीहीका सेवक हूँ । हे राम ! इससे आपकी तो बड़ी तौहीन हुई, परन्तु आपके सदृश स्वामीका सेवक होनेका जो यश मुझे प्राप्त हुआ वह मेरे हृदयको तो सुख देनेवाला ही है । मैं बलिहारी जाऊँ, अब या तो आप इस हानिको सहिये अथवा मुझे ही अपनी सेवाके योग्य बना लीजिये । अपने हृदयमें विचारकर और मेरे लिये हितकारी जानकर ऐसा ही कीजिये जिससे मैं आपके