भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 141

कवितावली १३८ धनुषधारी रूपका ही ध्यान कर सकूँ [ अर्थात् आपको छोड़कर किसी और पदार्थकी ओर मेरा चित्त ही न जाय ] । आपु हौं आपुको नीकें कै जानत, रावरो राम ! भरायौ-गढायो । कीरु ज्यों नामु रटै तुलसी, सो कहै जगु जानकीनाथ पढ़ायो ॥ सोई है खेदु, जो बेदु कहै, न घटै जनु जो रघुबीर बढ़ायो । हौं तौ सदा खरको असवार, तिहारोइ नामु गयंद चढ़ायो ॥ मैं स्वयं अपनेको अच्छी तरह जानता हूँ । हे राम ! मैं तो आपहीका रचा और बढ़ाया हुआ हूँ । यह तुलसीदास सुग्गेकी भाँति नाम रटता है, उसपर संसार यही कहता है कि यह पढ़ाया हुआ है । इसीका मुझे खेद है । किन्तु वेद कहता है कि जिस मनुष्यको रघुनाथजीने बढ़ा दिया वह कभी घट नहीं सकता । मैं सदासे गधे- पर ही चढ़नेवाला (अत्यन्त निन्दनीय आचरणोंवाला) था, आपके नामने ही मुझे हाथीपर चढ़ा दिया है (अर्थात् इतना गौरव प्रदान किया है) । छारतें सँवारि कै पहारहू तें भारी कियो, गारो भयो पंचमें पुनीत पच्छु पाइ कै । हौं तौ जैसो तब तैसो अब अधमाई कै कै, पेटु भरौं, राम ! रावरोई गुनु गाइकै ॥ आपने निवाजेकी पै कीजै लाज, महाराज ! मेरी ओर हेरि कै न बैठिए रिसाइ कै । पालि कै कृपाल ! ब्याल-बालको न मारिए, औ काटिए न नाथ ! विषहूको रूखु लाइ कै ॥६१॥