भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

१३९ उत्तरकाण्ड आपने मुझ धूलके समान तुच्छ प्राणीको सँभालकर पहाड़से भी भारी (गौरवान्वित) बना दिया और आपका पवित्र पक्ष पाकर मैं पंचोंमें बड़ा हो गया। मैं तो अपनी अधमतामें जैसा पहले था वैसा ही अब भी हूँ। हे राम! बस, आपका ही गुण गाकर पेट पालता हूँ। परन्तु हे महाराज! आप अपनी कृपाकी लाज रखिये और मेरी ओर देखकर क्रोध करके न बैठ जाइये। हे कृपालु! सर्पके बालकको भी पाल-पोषकर नहीं मारना चाहिये और न विषका वृक्ष भी लगाकर उसे काटना चाहिये। वेद न पुरान-गानु, जानौं न बिग्यानु ग्यानु, ध्यान-धारना-समाधि-साधन-प्रवीनता । नाहिन विरागु, जोग, जाग भाग तुलसीकें, दया-दान-दूवरो हौं, पापही की पीनता ॥ लोभ-मोह-काम-कोह-दोस-कोसु मोसो कौन ? कलिहूँ जो सीखि लई मेरियै मलीनता । एकु ही भरोसो राम ! रावरो कहावत हौं, रावरे दयालु दीनबंधु ! मेरी दीनता ॥६२॥ मैं न तो वेद या पुराणोंका गान जानता हूँ और न विज्ञान अथवा ज्ञान ही जानता हूँ, और न मैं ध्यान, धारणा, समाधि आदि साधनोंमें प्रवीणता ही रखता हूँ। तुलसीके भाग्यमें वैराग्य, योग और यज्ञादि नहीं हैं। मैं दया और दानमें दुर्बल हूँ [अर्थात् दान और दयासे रहित हूँ] तथा पापमें पुष्ट हूँ। मेरे समान लोभ, मोह, काम और क्रोधरूप दोषोंका भण्डार कौन है? कलियुगने भी मुझसे ही मलिनता सीखी है। हाँ, एक ही भरोसा मुझे है कि मैं आपका