कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहलाता हूँ। आप दीनोंके बन्धु और दयालु हैं मेरी यह दीनता है। रावरो कहावौं, गुनु गावौं राम ! रावरोई, रोटी द्वै हौं पावौं राम ! रावरी हीं कानि हौं। जानत जहानु, मन मेरेहूँ गुमानु बड़ो, मान्यो मैं न दूसरो, न मानत, न मानिहौं ॥ पाँचकी प्रतीति न भरोसो मोहि आपनोई, तुम्ह अपनायो हौं तबै हीं परि जानिहौं। गढ़ि-गुढ़ि, छोलि-छालि कुंदकी-सी भाईं वातैं जैसी मुख कहौं, तैसी जीयँ जब आनिहौं ॥६३॥ हे राम ! मैं आपका कहलाता हूँ और आपहींका गुण गाता हूँ और हे रघुनाथजी ! आपहीके लिहाजसे मुझे दो रोटियाँ भी मिल जाती हैं। संसार जानता है और मेरे मनमें भी बड़ा अभिमान है कि मैंने दूसरेको न माना, न मानता हूँ और न मानूँगा। मुझे न पंचोंका ही विश्वास है और न अपना ही भरोसा है, मैं गढ़-गुढ़ और छील-छालकर खरादपर चढ़ाई हुई-सी चिकनी-चुपड़ी बातें बनाता हूँ। वैसी ही जब हृदयमें भी ले आऊँगा तब समझूँगा कि आपने मुझे अपनाया है। बचन बिकारु, करतबउ खुआर, मनु बिगत-बिचार, कलिमलको निधानु है। रामको कहाइ, नामु बेचि-बेचि खाइ, सेवा- संगति न जाइ, पाछिलेको उपखानु है॥ तेहू तुलसीको लोगु भलो-भलो कहै, ताको