कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १४२ हूँ और न करूँगा ही ! ब्रह्माने भूलकर भी मेरे भाग्यमें भलाई नहीं लिखी। आपकी शपथ है, हे रामजी ! मुझको केवल आपके नाम- हीकी गति है। जो यहाँ (आपके सामने) झूठा है वह तो तीनों लोक और तीनों कालमें झूठा ही है। हे कृपालो ! तुलसीकी भलाई तो तुम्हारे ही किये होगी; बलिहारी जाऊँ, अब विलम्ब न कीजिये, क्योंकि मेरी दशा ठीक पानीसे भरी हुई खालके समान है। अर्थात् जैसे पानीभरी खाल बहुत जल्दी सड़ जाती है वैसे ही मेरे भी नष्ट होनेमें देरी नहीं है। रागको न साजु, न बिरागु, जोग, जाग जियँ, काया नहि छाड़ि देत ठाटिबो कुठाटको। मनोराजु करत अकाजु भयो आजु लगि, चाहै चारु चीर, पै लहै न टूकु टाटको ॥ भयो करतारु बड़े कूरको कृपालु, पायो नामप्रेमु-पारसु, हौं लालची बराटको । ‘तुलसी’ बनी है राम ! रावरें बनाएँ, ना तो धोबी-कौसो कूकरु, न घरको, न घाटको ॥६६॥ मेरे पास न तो राग अर्थात् सांसारिक सुख-भोगकी सामग्री है और न मेरे जीमें वैराग्य, योग या यज्ञ ही है; और यह शरीर कुचाल चलना नहीं छोड़ता । मनोराज्य (वासनाएँ) करते-करते आजतक हानि ही होती रही। यह चाहता तो अच्छे-अच्छे वस्त्र है, परन्तु इसे मिलता टाटका टुकड़ा भी नहीं । हे जगत्कर्ता प्रभो ! आप इस अत्यन्त कुटिलपर भी कृपालु हुए, मुझ कौड़ी (तुच्छ भोगों) के लालचीने भगवन्नामका प्रेमरूप पारस पाया। हे श्रीरामजी ! यह सब आपके बनाये बनी है, नहीं तो धोबीके कुत्तेके समान