कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४३ उत्तरकाण्ड मैं न घरका था और न घाटका ही (अर्थात् न मैं इस लोकको सुधार सकता था, न परलोकको)। ऊँचो मनु, ऊँची रुचि, भागु नीचो निपट ही, लोकरीति-लायक न, लंगर लवारु है। स्वारथु अगमु, परमारथकी कहा चली, पेटकीं कठिन जगु जीवको जवारु है॥ चाकरी न आकरी, न खेती, न बनिज-भीख, जानत न कूर कछु किसब कबारु है। तुलसीकी बाजी राखी रामहीकें नाम, नतु भेंट पितरन को न मूड़हू में बारु है॥६७॥ इसका मन ऊँचा है तथा रुचि भी ऊँची है, परन्तु भाग्य इसका अत्यन्त खोटा है। यह लोक-व्यवहारके लायक भी नहीं है तथा बड़ा ही नटखट और गप्पी है। इसके लिये तो स्वार्थ भी अगम है, परमार्थकी तो बात ही क्या है! पेटकी कठिनाईके कारण इसे संसार जीका जंजाल हो रहा है। यह न तो कोई चाकरी ही करता है और न खान खोदनेका काम करता है; इसके न खेती है, न व्यापार है; न यह भीख माँगता है और न कोई अन्य प्रकार- का धंधा या पेशा ही जानता है। तुलसीकी बाजी रामनामहीने रक्खी है, अन्यथा इसके पास तो पितरोंको भेंट चढ़ानेके लिये सिरपर बाल भी नहीं है। अपत-उतार, अपकारको अगारु, जग जाकी छाँह छुएँ सहमत ब्याध-बाधको। पातक-पुहुमि पालिबेको सहसाननु सो,