भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

१४५ उत्तरकाण्ड मैं (योगके आठों) अङ्गोंसे हीन हूँ, सब साधनोंसे रहित हूँ, मन-वचनसे मलिन हूँ तथा कुल और कर्मोंमें भी बड़ा पतित हूँ। मैं बुद्धि-बलहीन, भाव और भक्तिमे रहित, गुणहीन, ज्ञानहीन तथा भाग्य और ऐश्वर्यसे भी रहित हूँ। इस दीन तुलसीदासकी हीन अवस्थाका उद्धार करनेवाला तो रामका नाम ही है जिसे जिह्वासे जपकर मैं रामजीको भी छल चुका हूँ। मुझे रामनामसे ही प्रीति है, रामनाममें ही विश्वास है और मैं रामनामके ही कृपासे पैर पसारकर (निश्चिन्त होकर) सोता हूँ। मेरें जान जबतें हौं जीव है जनम्यो जग, तबतें बेसाह्यो दाम लोभ, कोह कामको। मन तिन्हीकी सेवा, तिन्ही सों भाउ नीको, बचन बनाइ कहौं 'हौं गुलामु रामको'॥ नाथहूँ न अपनायो, लोक झूठी है परी, पै प्रभुहू तें प्रबल प्रतापु प्रभुनामको। आपनीं भलाई भलो कीजै तौ भलाई, न तौ तुलसीको खुलैगो खजानो खोटे दामको ॥७०॥ मेरी समझसे जबसे मैं जगत्में जीव होकर जन्मा हूँ तबसे मुझे लोभ, क्रोध और कामने दाम देकर मोल ले लिया है। (अतएव) मनसे उन्हींकी सेवा होती है और उन्हींसे गहरा प्रेम है; परन्तु बात बनाकर कहता हूँ कि मैं तो श्रीरामका गुलाम हूँ। हे नाथ! आपने भी (अयोग्य समझकर) नहीं अपनाया; किन्तु लोकमें झूठी प्रसिद्धि हो गयी (कि मैं रामका गुलाम हूँ)। परन्तु प्रभुसे भी प्रभुके नामका प्रताप अधिक प्रचण्ड है। (अतः) क० १०-