कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १४६ अपनी भलाईसे यदि आप मेरा भला कर दें तो अच्छा ही है, नहीं तो तुलसीके कपटका खजाना खुलेगा ही । जोग न बिरागु,जप, जाग, तप, त्यागु,ब्रत, तीरथ न धर्म जानौं, वेदविधि किमि है । तुलसी-सो पोच न भयो है, नहिं हैहै कहूँ, सोचैं सब, याके अघ कैसे प्रभु छमिहैं ॥ मेरें तौ न डरु, रघुवीर ! सुनौ, साँची कहौं, खल अनखैहैं तुम्हें, सज्जन न गंमिहैं । भले सुकृतीके संग मोहि तुलाँ तौलिए तौ, नामकें प्रसाद भारु मेरी ओर नमिहै ॥७१॥ मैं न तो अष्टाङ्गयोग जानता हूँ और न वैराग्य, जप, यज्ञ, तप, त्याग, व्रत, तीर्थ अथवा धर्म ही जानता हूँ । मैं यह भी नहीं जानता कि वेदका विधान कैसा है । तुलसीके समान पामर न तो कोई हुआ है और न कहीं होगा । ( इसीलिये ) सभी सोचते हैं, न जाने, प्रभु इसके पापोंको कैसे क्षमा करेंगे । किन्तु हे रघुनाथजी ! सुनिये, मैं ( आपसे ) सच कहता हूँ, मुझे कुछ भी डर नहीं है । ( यदि आप मुझे क्षमा कर देंगे तो ) दुष्ट लोग तो अवश्य आपसे अप्रसन्न होंगे, किन्तु सज्जनोंको इससे कुछ भी दुःख नहीं होगा । यदि आप मुझे किसी बड़े पुण्यवान्के साथ तराजू- पर तोलेंगे तो आपके नामकी कृपासे मेरी ओरका पलड़ा ही झुकता हुआ रहेगा । जातिके, सुजातिके, कुजातिके पेटागि बस खाए टूक सबके, बिदित बात दुनीं सो ।