कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १२ चौंके विरंचि संकर सहित, कोलु कमठु अहि कलमल्यौ। ब्रह्मांड खंड कियो चंड धुनि जबहिं राम सिव धनु दल्यौ ॥११॥ जिस समय श्रीरामचन्द्रजीने शिवजीका धनुष तोड़ा उस समय उसका प्रचण्ड शब्द ब्रह्माण्डको पार कर गया और उसके आघातसे सारे पर्वत, समुद्र और तालाबोंके सहित अत्यन्त भारी पृथ्वी डगमगाने लगी, सर्प बहिरे हो गये, सम्पूर्ण चराचर एवं इन्द्रादि दिक्पालगण व्याकुल हो उठे, दिग्गज लड़खड़ाने लगे, रावण मुँहके बल गिरने लगा, देवताओंके विमान, चन्द्रमा और सूर्य आकाशमें परस्पर टकराने लगे, महादेवजीसहित ब्रह्माजी चौंक पड़े और वाराह, कच्छप तथा शेषजी भी कलमला उठे। लोचनाभिराम घनस्याम रामरूप सिसु, सखी कहै सखीसों तूँ प्रेमपय पालि, री ! बालक नृपालजूकें ख्याल ही पिनाकु तोरयो, मंडलीक-मंडली-प्रताप-दापु दालि री ॥ जनकको, सियाको, हमारो, तेरो, तुलसीको, सबको भावतो हैंहै, मैं जो कह्यो कालि, री । कौसिलाकी कोखिपर तोषि तन वारिये, री, राय दसरथकी बलैया लीजै आलि री ॥१२॥ कोई सखी दूसरी सखीसे कहने लगी—अरी सखि ! रामचन्द्रजीके इस नयनसुखदायक मेघश्यामरूपरूपी शिशुका तू प्रेमरूपी दूधसे पालन कर । यहाँ एकत्रित हुए मण्डलेश्वरोंको जो अपने प्रतापका अभिमान था उसे चूर्णकर इस राजकुमारने संकल्प- मात्रसे ही धनुष तोड़ डाला । मैंने जो तुझसे कल कहा था, अब