भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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११ बालकाण्ड राजसमाजमें तुलसीदासके समर्थ प्रभु दशरथनन्दन रामने चपलतासे चन्द्रमौलि भगवान् शङ्करका धनुष चढ़ा दिया । मयनमहनु पुरदहनु गहनु जानि आनिकै सबैको सारु धनुष गढ़ायो है। जनकसदसि जेते भले-भले भूमिपाल किये बलहीन, बलु आपनो बढ़ायो है ॥ कुलिस-कठोर कूर्मपीठतें कठिन अति हठि न पिनाकु काहूँ चपरि चढ़ायो है। तुलसी सो रामके सरोज-पानि परसत ही टूट्यौ मानो बारे ते पुरारि ही पढ़ायो है ॥१०॥ श्रीमहादेवजीने कामका दलन और त्रिपुरका नाश बहुत कठिन समझकर सब कठोर पदार्थोंको मँगाकर उनका साररूप यह धनुष बनवाया था। उसने जनकजीकी सभामें जितने बड़े-बड़े राजा आये थे, उन सभीको बलहीन कर अपना ही बल बड़ा रक्खा । वज्रसे भी कठोर और कछुएकी पीठसे भी कड़े उस धनुषको कोई भी राजा बलपूर्वक फुर्तीसे नहीं चढ़ा सका । तुलसीदासजी कहते हैं--किन्तु वही धनुष भगवान् रामके करकमलका स्पर्श होते ही टूट गया, मानो महादेवजीका उसे बालेपन (आरम्भ) से यही पाठ पढ़ाया हुआ था। डिगति उर्वि अति गुर्वि, सर्व पब्बै समुद्र-सर । ब्याल बधिर तेहि काल, बिकल दिगपाल चराचर ॥ दिग्गयंद लरखरत परत दसकंधु मुखख भर । सुर-बिमान हिमभानु भानु संघटत परसपर ॥