भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 13

कवितावली १० राजालोग झुंड-के-झुंड महाराज जनकके यहाँ आकर उनके स्थानमें छाये हुए हैं। वे बड़े बलवान्, प्रतापी और तेजस्वी हैं, उनके शरीर और वेष भी बड़े सुन्दर हैं और वे श्रीसीताजीको वरण करनेके शुभ कार्यसे बुलाये गये हैं। श्रेष्ठ वन्दीजन उनकी बिरदावलीका बखान करते हैं, बाजेवाले बाजे बजाते हैं तथा उस राजसमाजके कोई-कोई वीर भी अपनी भुजाएँ ठोंकते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं- इस समय जनकपुरके जितने नर-नारी हैं वे सभी अवधकेसरी भगवान् रामका मुख बारंबार देखते और मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं। सियकें स्वयंवर समाजु जहाँ राजनिको राजनके राजा महाराजा जानै नाम को। पवनु, पुरंदरु, कृसानु, भानु, धनदु से, गुनके निधान रूपधाम सोमु कामु को॥ बान बलवान जातुधानप सरीखे सूर जिन्हकें गुमानु सदा सालिम संग्रामको। तहाँ दसरथकें समत्थ नाथ तुलसीकें चपरि चढ़ायौ चापु चंद्रमाललामको ॥९॥ सीताजीके स्वयंवरमें, जहाँ राजाओंका समाज जुड़ा हुआ था, बहुत-से राजराजेश्वर और सम्राट् थे, उनके नाम कौन जानता है ? वे वायु, इन्द्र, अग्नि, सूर्य और कुबेरके समान गुणके भण्डार और ऐसे रूपराशि थे कि उनके सामने चन्द्रमा तथा कामदेव भी क्या हैं ? उनमें बाणासुर और राक्षसराज रावण-जैसे शूरवीर भी थे, जिन्हें संग्रामभूमिमें सदा ही सकुशल रहनेका अभिमान था [ अर्थात् जो संग्राममें सदा ही दृढ़रूपसे क्षतरहित विजय लाभ करते थे ]। उसी